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आता है प्‍यार

दौड़ते हाथी की पीठ पर तुम्‍हें हंसता देखा था स्‍टेडियम के गोल मैदान पर खिंचे चॉक की फांक पर दौड़ता, बीच दौड़ गिरता देखा था सपने में दीखी हों नीली पहाड़ि‍यां, उसकी घुमराह रपटीली लाल पगडंडियों पर अबूझ खुशियों में नहाया, भागते देखा था. सपनों के ज़रा, एकदम
 
Pramod Singh
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होऊंगा जहां नहीं दीखूंगा

घबराहट के किसी क्षण घेराई मेंहदबद की खोजाई, ज़ि‍रह की लड़ाईमें खुद को खोजने निकलूंगा, कभीनिकला करते थे जैसे कॉर्टोग्राफ़रमापने पहाड़, पानी की चौड़ाईचार दिन और तीन रातों के सफ़रके बाद दीखेगा कोई सूखा मैदाननिर्जन अनजान, झमेले दारु के अड्डेपर कई सारे सिर
 
Pramod Singh
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दौड़ती, अटकती, कहानी

घोड़ा रास्‍ता भूल गया होगा, एक सरपट तेज़ी से दौड़ता, कुछ आगे जाकर बार-बार अचकचाकर फिर खड़ा रह जाता होगा, ताज़्ज़ुब और तक़लीफ़ में जबड़े चबाता, अपने सोचने को सिलसिले में दुरुस्‍त करने की कोशिश करता, कि ग़लती कहां हो रही है, कि मन में यह किसने रास खींची
 
Pramod Singh
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अचक्‍के

रोज़-रोज़ हंसता, बेमतलब जाया होता दीखूंगा, अपने शरम में मुंह चुराता, इस गली उस सड़क यूं ही आता-जाता फिर देखोगे एक दिन अचक्‍के में ही मिलूंगा कभी जैसे खुद को भी तुम पाओगे ऐसे ही कभी गोपन क्षणों अप्रत्‍याशित, अचकचाये हुए धीमे स्‍वयं के करीब आते, दुलराते
 
Pramod Singh
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इस एकदम ज़रा देर के लिए में जितना जीवन होगा..

एक‍दम ज़रा देर के लिए होगा, बस ज़रा ज़रा देर के लिए कि जिजीविषा भरी वह आवाज़ धौंकती आएगी, बगल से गुज़र जाएगी, इक सिसकारी छाती पर भारी, लिपटे लपेटे जैसे आग और धुएं के धुंध में दगे गुज़रते थे वो गुज़रे ज़मानों के इंजन, धक् कलेजा मुंह को आता था और माथे के
 
Pramod Singh
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ठिल-ठिल की राज और नीति..

जनहित के आशयोंवाली भीड़भरायी जमघटों में बैकग्राउंड में गाना बजता रहता है ‘ये जो पब्लिक है सब जानती है’, उत्‍साही एक्टिविस्‍ट बेसुरा गुनगुनाता घुटने थपथपाता भी रहता है, हां, हां, जानती है, जानती है, नेताजी ने राजनीतिक समीक्षा की सही शब्‍दावली सजवाकर सही
 
Pramod Singh
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सपना..

सपने देखना, और थककर सोने जाना जागकर फिर देखना व्‍यौहारी, दुनिया-निहारी कनिया चौंकी पूछे जो आये किधर से और जाओगे किधर, बाबू मीठे लजाकर कहना, जी, सपना, सपना?
 
Pramod Singh
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वक्‍तव्‍य..

सोचिए तो, इतने महीन जायकों को बगलिया थाली भर भात, सेम की तरकारी से अभी भी पसीज जानेवाले एक बिहारी की बौद्धिक लाम क्‍या होगी, न हासिल डकारों में घिरा-गिरा होगा, उतरने को लगाम होगा, ऊपर उठकर फैलने का वितान कहां होगा? लेकिन देखिए मज़ा, फिर-फिर खराब होता
 
Pramod Singh
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लिखना..

जानता हूं बेमतलब है, अंधों के अखाड़े रंग सजाना कंटीले झाड़ पर रेशमी रुमाल फैलाना है, फिर भी रोज़ घिसता, घिसे, लिखता लिखे जाता हूं, अपने को फुसफुसाकर बताता, लिखना लिखना. और सच जानिए, वज़हविहीन, मक़सदहीन है भाग-भागकर मेरा यह गिरना, रात-बिरात की हूक, सब
 
Pramod Singh
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सपने से बाहर

पहाड़ से उठे दिनों गिरी स्याही की तरह समय बीता जाता है. गिरी हुई दुनिया में लौमहर्षक फुंकार पर सवार एक सफ़ेद, साफ़ घोड़े के भागने के बिम्ब क्या होंगे का भोले मन मनन करता हूं, पिटे सामर्थ्य और समझ की फंसी रेल में थोड़ा अटकता, बिछलने से अब गिरा तब गिरा
 
Pramod Singh
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मुलाक़ात..

मन का पतंग किसी खूंटे उड़ता होता, भाग्य पढ़ने की किताब किसी झोले छुटी होती, वैसी नाउम्मीदी में सुख टकराता ऐसे ही किसी मामूली राह, भूली पगडंडी पर, और फिर इसके पहले समझें अचक्के हुआ क्या, यह कैसा फेर, गुरु, सचमुच मिले सुख से ऐसा अपना नसीब, कि जाने किन
 
Pramod Singh
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पत्‍थर हैं शब्‍द कहां है?..

पत्‍थर दर पत्‍थर जुड़ती मीनार खड़ी होती की तर्ज पर शब्‍द गोड़ते, गांठते किताब तैयार हो जाती लेकिन किताब है कि बार-बार खुद को बचा ले जाती है. पथरीले पहाड़ पर खड़ा हूं और मानो पत्‍थर पकड़ में न आते दबी आवाज़ में उपहास करते हों- हमें साधोगे, ऐसा, रियली?
 
Pramod Singh
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तुम जो आये नहीं..

क्‍या था सपना था? कैसे चुपके से कब चला आया और आया तो इतनी देर पीछे ख़बर हुई? सिर को हाथों में लेकर अब क्‍या आना था आया और जाते में भी मर्जी पूछकर कहां गया. कैसी तो अंदर से आह छूटती है. हाथ की चीज़ उंगलियों से फिसलकर फ़र्श पर गिरती है तब ख़्याल आता है
 
Pramod Singh
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किसी और के सपने में..

चेतन ऊंचाइयों की उड़ाई न होगी ऊब व असमंजस के चक्‍करदार घेरे होंगे रह-रहकर जाने क्‍या अंधेरे हैं कैसे गिर पड़े की उमेंठती गहरी गहराइयां होंगी. कभी रंग दिखता होगा- दूर, कभी और किसी और के सपने में देखा हो जैसे, कभी सुख सूझता होगा- पगलाये, अनजाने देश में
 
Pramod Singh