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माँ के साथ मदर्स डे। हमारे जमाने में तो एक ही डे होता था!.................................. घुघूती बासूती

आज शाम को मैं माँ के साथ उनके कमरे में बैठ समाचार देख रही थी, या यूँ कहिए देखने की अभिलाषा लिए थी। बहुत सारे विज्ञापनों के बाद जब समाचारों की जगह कुछ फिल्मी हस्तियाँ अपनी माँओं की बात कर रही थीं/ रहे थे तो मैं परेशान थी कि समाचार क्यों नहीं आ रहे कि
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maan ke charno me

भाषा विज्ञानियों के लिए भले ही पहला शब्द ‘ए’ अथवा ‘अ’ या फिर ‘अलीफ’ या ‘बे’ होता होगा, लेकिन व्यावहारिकता में यह फार्मूला बेमानी लगता है। दुनिया में किसी बच्चे के कंठों से फूटने वाली पहली किलकारी में ‘मां’ शब्द छिपा हुआ रहता है। कहना गलत नहीं होगा कि कोई
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माँ तुझे सलाम!!!

वैसे तो हम दोनों का यही मानना है कि जिन मौक़ों के लिए दिन मुकर्रर कर दिए जाते हैं उनकी अहमियत, बस उस दिन या तारीख तक मह्दूद होकर रह जाती है, एक फॉर्मेलिटी की तरह. और दुनिया का सबसे मीठा लफ्ज़ और सबसे पाकीज़ा रिश्ता, सिर्फ एक दिन का मोह्ताज नहीं. हमारे लिए
 
SAMVEDANA KE SWAR