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मज़दूर यानि पुरुष मज़दूर?

( आज मई दिवस है यानि कि दुनिया भर के कामगारों के संघर्ष और बलिदान को याद करने का दिन। लेकिन विमर्शों के उत्तर आधुनिक दौर में कुछ ऐसा प्रपंच रचा गया है कि लोगों की एक्सक्लूसिव पहचानों पर तो बहुत ज़ोर है पर सामूहिक पहचाने धुंधली हो गयी हैं। या तो आप दलित
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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मई दिवस पर विशेष - दादातंत्र ,युद्धतंत्र और भोगतंत्र से तबाह मजदूरवर्ग

      मई दिवस को आज जिस उल्लास और जोशोखरोश के साथ मनाया जाना था वह जोशोखरोश गायब है। मजदूरवर्ग गंभीर संकट में है,यह संकट बहुआयामी है। आर्थिकमंदी में पूंजीपतियों को संकट से उबारने के लिए पैकेज दिए गए लेकिन इन पैकेजों का लाभ
 
jagadishwar chaturvedi
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मई दिवसः हे मार्केट के शहीदों का खून बेकार नहीं जायेगा - अरुण माहेश्वरी

       कार्ल मार्क्‍स और फ्रेडरिख एंगेल्स ने ‘कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणा–पत्र’ का प्रारंभ इन पंक्तियों से किया था – समूचे यूरोप को एक भूत सता रहा है – कम्युनिज्म का भूत। 1848 में लिखे गये इन शब्दों के बाद आज 154 वर्ष बीत गये हैं और
 
jagadishwar chaturvedi
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तू ज़िंदा है तो ज़िन्दगी की जीत पर यक़ीन कर

आष्ट्रेलिया में काम के घंटे आठ किये जाने के लिये 1886 में लगाया गया पोस्टर( (युवा संवाद के प्रदेश संयोजक प्रदीप की मई दिवस पर लेखमाला का तीसरा और अंतिम अंश) ऐसा नहीं है कि आज पूंजी के निजाम के खिलाफ दुनिया में मजदूर प्रतिरोध नहीं कर रहे है। लेकिन इस
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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हमारा समय और समाजवाद

दुनिया के मज़दूरों एक हो!युवा संवाद तथा स्त्री अधिकार संगठन  ने पिछले साल की ही तरह इस साल भी मई दिवस मनाने का निश्चय किया है। इस साल हमने  ' हमारे समय में समाजवाद' विषय पर एक परिचर्चा आयोजित करने का इरादा किया है जिसमें जाने माने
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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सुने बहुत है किस्‍से तुमने राजाओं के, हूरों के,/पर जाना मत भूल खून के छींटे उन मजदूरों के

आज एक मई है। यह सच है कि ये दौर अंधेरे का दौर है। आज बुराई की ताकतें हावीं हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि न हमारी हार अंतिम है न उनकी जीत अंतिम। अंतिम जीत इंसानियत की होना तय है। इसलिए आज उसके सपनों को भी जिंदा रखना है। पेश है एक अनजान कवि नरेन्‍द
 
Kapil