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मन्दी की मार झेलते मध्‍य और पूर्वी यूरोप के मजदूर

आज के पूर्वी यूरोप के देशों की औद्योगिक-वैज्ञानिक प्रगति जिस हद तक भी है वह मुख्यत: समाजवादी अतीत की देन है, जबकि इसके जो भी संकट हैं वे पूँजीवादी ढाँचे की देन हैं, यह इतिहास की सच्चाई है।स्तालिन की मृत्यु के बाद ही रूस और पूर्वी यूरोप में पूँजीवाद की
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मंदी के दौड़ में सिगरेट का धुंआ उरता रहा

मंदी-मंदी-मंदी........................................कहाँ है मंदी ? ये मंदी क्या होता है भाई आदि सवाल का जखीरा सिगरेट के धुँए में उरता रहा । जब मैंने उस व्यक्ति से ये जानने की कोशिश की कि भाई आप कौन सा सिगरेट पीतेहो और कितना पीते हो तो जवाब में उन्ह
 
सुरेन्द्र Verma
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मंदी और आउटसौर्सिंग

मंदी के इस दौर में अगर कुछ बढ़ा तो उसमें से एक है - पश्चिम के देशों से हमसे मंदी तो नहीं आयात किया है. पर, हमारी मिडिया और कारपोरेट ने उसके डर को आयत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अब तक हम अमेरिकी और यूरोपियनों से से उनके डर और आर्थिक मंदी से हुए दुःख
 
निशान्त
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मंदी ,माणूस आणि महाराज...

जगभर मंदीची लाट जोरदार वहात आहे.अजून वर्षभर तरी ती रहाणार असे आपले अर्थतज्ञ सांगत आहेत.सहाजीकच भारतालाही ती झळ पोचत आहेच.बऱ्याच जणांच्या नोकऱ्या गेल्या आहेत.व्यवसाय बंद पडत आहेत.महागाई वाढत आहे.अशा सर्व गोष्टींचा परीणाम शेवटी माणसाच्या मनावर होणारच.मग तो
 
ओंकार देशमुख
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