पुनश्च
प्रतीक्षारत थीसदियों से पत्थेर के अंतस में,तुम झरना बनकर आयेफूटकर मैं बहीबन लहर लहर।कालजयी रात थी,हुई अनोखी बात थी,स्मरणीय इतिहास बना वह सुनहरा पहर।हो तुझमें समाहितअंश-अंश आह्लादित ,मंजिल के संग-संगहुआ प्रारंभ सफ़र.
Dec 28 2009 04:32 PM



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