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मंच पर पंहुच कर बगले क्यों झांकने लगे जनाब!

शब्द नही चित्र!पिछ्ले दिनों यंहा एक सरकारी कार्यक्रम हुआ जिसमे सरकारी लोगों को आना था।कार्यक्रम की तैयारी पूरी हो चुकी थी और मंच भी सज-धज कर तैयार था,बस इंतज़ार था तो उद्घाट्न की औपचारिकताओं के बाद कार्यक्र्म की शुरूआत का,तभी सरकारी से भी ज्यादा एक
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मण्डी बनाया विश्व को

लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा क्रेन पर ऊँचा चढ़ा कर, चैन उसकी तोड़ दी लोभ का दर्शन बना, मझधार नैया छोड़ दी ऋण-यन्त्र से मन्दी बढ़ी, पोखर में डॉलर बह लिया अर्थ की सरिता में भोंडे नाच से मोहित किया बहकता उन्माद सिर पर क्यों हमें बहका न
 
Harihar Jha हरिहर झा