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पापा की बिटिया और ट्रेन-पकड़-शौर्य गाथा (भोपाल यात्रा - अंतिम भाग)

घर से रेल्वे स्टेशन का रास्ता होगा यही कोई बीस मिनिट का. स्वतन्त्रता दिवस पर काफ़ी सारा बाज़ार बन्द था, सड़कों पर ज्यादा आवाजाही नहीं थी. पन्द्रह मिनिट में ये सफ़र पूरा कर लेने की उम्मीद लेकर २:१० पर घर से निकला गया. ट्रेन २:४० पर थी. लगा था कि इतना समय
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बोट क्लब, मल्होत्रा जी और १५ अगस्त पर डांस पे चांस (भोपाल यात्रा - ३)

रात भर रुक-रुक कर हल्की फ़ुहार पड़ती रही. खिड़की से ठंडी हवा के मस्त मद्धम झोंके आकर तन को हिलोरते रहे और भोर की पहली किरण के साथ जब निद्रा देवी की शरण से बाहर आये तो विगत दिवस की यात्राओं की थकान छू हो चुकी थी. रात मोबाइल को ड्यूटी पर तैनात करके सोये थे कि
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फ़ा़टकचंद और झंडूलाल (भोपाल यात्रा - २)

१४ अगस्त, शुक्रवार,दोपहर ०२:२० बजे'लगभग' सही समय पर चली ट्रेन 'एकदम' सही समय पर भोपाल स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर दाखिल हुई. ड्राइवर ने इस यात्रा में अंतिम बार ब्रेक का उपयोग किया और रेलगाड़ी ने प्लेटफ़ॉर्म नम्बर एक पर अपना पड़ाव डाल दिया. इस बार घर से रवाना
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क्या घोस्ट बस्टर को "सूरमा भोपाली" सम्मान नहीं मिलना चाहिये?

ऊँ श्री फ़ुरसतियाय नमःगई जून में जब हफ़्ते भर की इन्दौर, उज्जैन और भोपाल की यात्रा से लौटे थे तो मनभर मंसूबे बांधे थे कि इस बार एक यात्रा विवरण लिखकर ब्लॉग पर चिपका ही देंगे. मगर जैसा कि हर उच्च कोटि के विचार के साथ होता आया है, क्रियान्वयन की राह में सतत