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मृदंगनुमा भवन

मृदंगनुमा भवन मृदंगनुमा भवन जो, ढोलक जैसा होय।बरतन बाजे ढोल से, ढोली ऐसा रोय ।।ढोली ऐसा रोय, ढोलण परेशां होवे ।डॅाक्टर आवे रोज, श्मशान अचानक जोवे ।।कह ‘वाणी’ कविराज, बदलो यह जीवन ढ़ंग।नई पत्नी आवे, तुम त्यागो यह मृदंग।। शब्दार्थ: ढोली = भवन का मालिक, ढोलण
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खरीद ले प्लाट आयत

खरीद ले प्लाट आयत आयत भारी आय दे, दे सुन्दर सन्तान। आय सिद्धियाँ दौड़ के,खूब बढ़ाए मान।। खूब बढ़ाए मान, और बनाय पहलवान। सब शीष यँू झुकाय , जैसे उनके भगवान।। कह ‘वाणी’ कविराज , समझ कुरान की आयत। लेय पैसे उधार , खरीदलो प्लाट आयत।। शब्दार्थ: आयत = आमने सामने
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