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भिक्षुक

(फोटो साभार: Ronn Ashore - Flickr)[वह आता,दो टूक कलेजे के करतापछ्ताता पथ पर आता – निराला ]दिसंबर की ठिठुरती ठंड मेंदिल्ली के जनपथ परमुझे याद आ गए कविवर निरालाजब दिखा ‘भिक्षुक’ मुझे इकख़ुद में गठरी की तरह सिमटा हुआऔर माँगने को रुपए - दो रुपए सभी को
 
SAMVEDANA KE SWAR
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आधुनिक भिखारी

एक भिखारिन ने आवाज लगाईमाँ घर से निकल कर बाहर आईभिखारिन बोली कुछ दे दो खानामाताजी बोली बाद में आनाबह बोली क्या अभी खाना मना हैमाँ बोली नहीं अभी खाना नहीं बना हैजब बन जाएगा मैं तुझे दे दूंगीवह बोली क्यो आप परेशान होगीमेरा सेल नं. ले लो मुझे SMS कर देनामैं
 
ajit kumar mishra
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