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शब्द चर्चा समूह

हिन्दी शब्दों के समान्तर अर्थ; हिन्दी से उर्दू व उर्दू से हिन्दी में अर्थ; अंग्रेज़ी से हिन्दी व हिन्दी से अंग्रेज़ी में अर्थ; हिन्दी से अन्य भारतीय भाषाओं व अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अर्थ; हिन्दी से अरबी-फ़ारसी व अरबी-फ़ारसी से हिन्दी में अर्थ पर
 
अभय तिवारी
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विलुप्ति के कगार पर भाषा-बोलियां

आज से पांच दशक पूर्व जब मैं शोध हेतु राजियों की जंगली बस्तियों में गया तो मैंने पाया कि वे अलगाव की स्थिति से बहुत कुछ उबर चुके थे। कभी की गुहावासी और पत्रधारिणी जाति के वे लोग अपने पड़ोसियों के खेतों में खेतिहर मजदूरों का काम करने लगे थे। लकड़ी के बरतनों
 
विजय गौड़
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हिन्दी का संस्कृतीकरण-2

सुप्रसिद्ध प्रगतिशील आलोचक-विचारक डॉ रामविलास शर्मा भारत की भाषा समस्या पर आधी सदी तक लगातार लिखते रहे। उनके मुताबिक देश की जातीय समस्या का ही एक हिस्सा है भाषा समस्या। यहां पेश है दो भागों में उनका एक महत्वपूर्ण आलेख जो उन्होंने  1948 में लिखा था।
 
अजित वडनेरकर
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हिन्दी का संस्कृतीकरण

सुप्रसिद्ध प्रगतिशील आलोचक-विचारक डॉ रामविलास शर्मा भारत की भाषा समस्या पर आधी सदी तक लगातार लिखते रहे। उनके मुताबिक देश की जातीय समस्या का ही एक हिस्सा है भाषा समस्या। यहां पेश है तीन भागों में उनका एक महत्वपूर्ण आलेख जो उन्होंने  1948 में लिखा था।
 
अजित वडनेरकर
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बाधाओं के बीच नई चाल में ढल रही हिंदी

बाधाओं के बीच नई चाल में ढल रही हिंदीकांति  कुमार जैन जब मैं पिछले दिनों की प्रसिद्ध फिल्म लगे रहो मुन्नाभाई देखकर लौट रहा था तो मेरे 20 वर्षीय नाती ने अचानक मुझसे पूछा- नानाजी मैंने कक्षा में गांधीवाद के बारे में तो पढ़ा था
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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इंटरनेट पर ‘वेब पतों’ की लैटिन लिपि से मुक्ति – समाचार

बीबीसी की वेब-साइट (bbc.co.uk) पर एक समाचार पढ़ने को मिला कि अब इंटरनेट पर प्राप्य ‘वेब पतों’ के लिए लैटिन अक्षरों की अनिवार्यता पूरी तरह समाप्त कर दी गयी है । यह खबर सी-नेट की वेब साइट पर भी पढ़ने को मिली है । इसे ‘ऐतिहासिक’ घटना बताते हुए बीबीसी आगे
 
योगेन्द्र जोशी
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मत कर मोह तू : देवनागरी के रोमनीकरण के विमर्श

 " विमर्श के लिए लेख पुनः प्रेषित है,असग़र वजाहत के सुझाव पर कि हिंदी रोमन लिपि में भी लिखी जाये. ज़रूरी नहीं है कि सुझाव स्वीकार ही किया जाये  लेकिन इस पर विमर्श तो किया ही जाना चाहिएउमेश "इस सन्देश के साथ प्राप्त लेख को  पाठको के विमर्श
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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भाषा में वर्चस्व निर्माण की प्रक्रिया

अमूमन भाषा का वर्ग या भाषा का स्त्रीबोध या स्त्री-भाषा जैसे पद-बंध सुनते ही ऐसा मालूम पड़ता है कि भाषा के प्रचलित विमर्श के स्थिर जल में कंकड़ फेंक दिया हो। भाषा में वर्ग और स्त्री बोध या स्त्री-भाषा जैसे विभाजन क्यों। भाषा तो बहता नीर है ,अनंत है,
 
sudha singh
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भाषा में वर्गहीनता और लिंगविहीनता का छद्म

भाषा का प्रयोग और भाषिक संकल्पनाएं वर्गाधारित रही हैं। भाषा को लेकर जितनी भी धारणाएं है उन सबमें एक आम राय है कि भाषा निरपेक्ष नहीं होती। बोलना कभी भी निरपेक्ष नहीं रहा है। भाषिक व्यवहार उदासीनता का व्यवहार नहीं हुआ करता न ही भाषा केवल सम्प्रेषण का
 
sudha singh
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सवाल भाषा का नहीं वजूद का है

सवाल भाषा का नहीं वजूद का है- डॉ. मदन गोपाल लढ़ा -             मायड़ भाषा राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता का मुद्दा राजनीति के गलियारों में उलझ कर रह गया है। गत साठ वर्षों से गांधीवादी तरीके से चल रहे
 
राजस्थानी रांधण
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षड्यंत्र को `ज़रूरत’ बताने की मासूमियत का मर्म

गत दिनों हिन्दी भारत के अंक में जब मैंने माननीय राजकिशोर जी का रोष व  विचारपूर्ण लेख प्रकाशित किया रोमन कथा वाया बाईपास अर्थात् हिन्दी पर एक और आक्रमण तो मुझे कुछ ईमेल मिले जिनमें  लोगों ने लिखा/ पूछा कि असगर वजाहत जी ने हिन्दी
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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भाषा एकांगी नहीं होती l

हम भाषा के बदलते रूप की बात करते हैं और प्राय: भाषा को हिंग्लिश (हिंदी तथा इंग्लिश )तक ही सीमित रख देते हैं। जब भी कभी हिंदी भाषा की बात की जाती है तो पहला सवाल अक्सर ये ही देखा जाता है कि हिंदी भाषा को अंग्रेज़ी भाषा के वर्चस्व से कैसे बचाया जाए। हम
 
प्रतिमा
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ऐसी खुशफहमी भी ठीक नहीं है, जोशी जी...!

जनसत्ता (6 दिसंबर, 2009) में प्रकाशित मेरे लेख ‘कला-आलोचना की भाषा’ (http://matmatantar.blogspot.com/2010/01/blog-post_08.html) पर दो बिल्कुल ही भिन्न तरह की प्रतिक्रिया दो भिन्न रूपों में आईं। पहली अलिखित, लेकिन दूसरी लिखित।मैं अपना छपा लेख देख-पढ़ भी न
 
राजू रंजन
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दो जिस्म मगर एक जान हैं हम ---

देसां में देस हरयाणा --जित दूध दही का खाना । ये गीत बचपन में बहुत सुनते थे --आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र पर।लेकिन क्या आप जानते हैं की हरियाणा राज्य पहले पंजाब का ही हिस्सा था।सन १९६६ में भाषा के आधार पर हरियाणा , पंजाब से अलग हुआ स्वतंत्र भारत के १७ वें
 
डॉ टी एस दराल
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अजीत वह, जो पराजित होता रहे

सफर के मित्र रंगनाथ सिंह ने पिछली किसी कड़ी में पूछा था कि उनके दायरे के कुछ लोग हैं जो अजित लिखते हैं और कुछ अजीत, सही क्या है। मैं जानता हूं कि इस पर लिखने से तमाम अजीत नाराज हो जाएंगे। किन्तु रंगनाथ सिंह की जिज्ञासा का जवाब भी ज़रूरी है। हिन्दी में
 
अजित वडनेरकर
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त्या रात्री पाऊस नव्हता

काही दिवसा पूर्वी, अश्याच एका संध्याकाळी, मी त्याला माझ्या कविता वाचून ऐकवत होतो. माझ्या इंग्रजी ब्लॉग वरील एका पोस्ट बद्दल आम्ही वाद घालत होतो. त्या पोस्ट हून मराठी ब्लॉग च्या कविता वर आम्ही कसे आलो, हे आठवत नाही पण, आलो होतो. दोन-चार कविता वाचून
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भाषा क्षमता कम हो रही है

आजकल हम रोज देखते हैं कि विभन्न कार्यक्रमों में लोग जो भाषा बोलते हैं वो इतनी हलकी होती है कि समझ में नहीं आता कि भाषाओं के मामले में समृद्ध भारत को क्या होता जा रहा है?  शिक्षा के तमाम अवसरों के बावजूद पढ़-लिखे लोग भी अनपढ़ों के बराबर ही लगते हैं।
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राष्ट्रभाषा, राजभाषा या संपर्कभाषा हिंदी

आज हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं । कुछ इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं । जबकि कुछ का मानना है कि हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है । आइए हम हिंदी के इन विभिन्न रूपों को विधिवत समझ लें, ताकि हमारे
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शब्दों की सत्ता का क्षरण रोकें - पंत

माखनलाल जी पुण्यतिथि पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय में व्याख्यानभोपाल, 30 जनवरी। शब्द की सत्ता से उठता भरोसा सबसे बड़ा खतरा है। इसे बचाने की जरूरत है। ये विचार माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पं. माखनलाल चतुर्वेदी की
 
जयप्रकाश मानस
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मज़ाक़ और मज़ेदारियां

पिछली कड़ी- ज़ाइका, ऊंट और मज़ाक़- का विस्तार हा स-परिहास, दिल्लगी के अर्थ में हिन्दी में सर्वाधिक जिस शब्द का इस्तेमाल होता है वह है मज़ाक़। मूलत रूप में यह शब्द सेमिटिक भाषा परिवार का है। परिहास-प्रिय व्यक्ति को मज़ाक़िया कहा जाता है और इसका सही रूप है
 
अजित वडनेरकर
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इसलिए नंगा है सच...

ख लील जिब्रान ने कभी लिखा था कि एक बार सच और झूठ नदी में स्नान करने पहुंचे। दोनो ने अपने-अपने कपड़े उतार कर नदी के तट पर रख दिए और झट-पट नदी में कूद पड़े। सबसे पहले झूठ नहाकर नदी से बाहर आया और सच के कपड़े पहनकर चला गया। सच अभी भी नहा रहा था। जब वह स्नान
 
अजित वडनेरकर
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शब्दांचा प्रवास

भाषेची गंमत अनुभवतांना आपल्या संग्रही भाषेचे ज्ञानही सहजपणाने जमा होते हे सांगतांना शांता शेळके यांनी राजीनामा या शब्दाचा गंमतीशीर प्रवास सांगितला आहे.मी तुमचे काम करायला तयार आहे व मला यासंबधी तुमच्या अटी मान्य आहे (म्हणजे मी राजी आहे) या अर्थाने जे
 
बाबासाहेब जगताप
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भाषा की क्लिष्टता

अक्सर लोग भाषा की क्लिष्टता की बात करते हैं । वस्तुत: भाषा क्लिष्ट नहीं होती । किसी भी भाषा में प्रयुक्त होने वाले शब्द परिचित या अपरिचित होते हैं । यदि हमें किसी भाषा के किसी शब्द का अर्थ मालूम नहीं है , तो हमें उस शब्द से परिचय प्राप्त करना चाहिए ।
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कहां है चित्रकला आलोचना की भाषा...?

इन दिनों कला आलोचना की भाषा मेरी चिंता में शामिल रही है। कई बार तो ऐसा लगता है, और जो शायद बिल्कुल सही भी है कि इतने सारे कला आन्दोलनों के बाद भी भारत के चित्रकला समीक्षकों ने आलोचना का अपना कोई निश्चित प्रतिमान नहीं गढ़ा है। यह कला आंदोलनों के इकहरेपन का
 
राजू रंजन
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दरकिनार है भाषा की शुद्धता का सवाल - 2

उच्चारण ( तलफ्फुज़ )- ध्वनि की शुद्धता के बिन्दु पर कई लोग मानते हैं कि बगैर उर्दू ज्ञान के उच्चारण दुरुस्त नहीं हो सकता। मगर ऐसा नहीं है। उर्दू भाषा की उत्पत्ति के पूर्व भारत में जो भाषा प्रचलन में रही , उस भाषा के मर्मज्ञों में इतनी प्रवीणता एवं कु
 
कुमार शैलेन्द्र
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दरकिनार है भाषा की शुद्धता का सवाल

लिखने-पढ़ने वालों, तथा समझने-बोलने वालों के सामने प्रायः भाषा का सवाल उठता रहता है। ऐसे प्रश्न खासकर लेखकों, कवियों, पत्रकारों, उद्घोषकों, वक्ताओं, गायकों, नाट्यकर्मियों एवं शिक्षकों को गहन विचार करने का आमंत्रण देते रहते हैं। बावजूद इसके हममें से अध
 
कुमार शैलेन्द्र
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बोले तू कौनसी बोली ! ३

४/५ साल हो गए इस घटनाको...मै अपनी किसी सहेलीके घर चंद रोज़ बिताने गयी थी। सुबह नहा धोके ,अपने कमरेसे बाहर निकली तो देखा, उसकी सासुजी, खाने के मेज़ पे बैठ ,कुछ सब्ज़ी आदि साफ़ कर रही थीं.......१२ लोग बैठ सकें, इतना बड़ा मेज़ था...बैठक, खानेका मेज़ और रसो
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I will try my level best-का मतलब? कभी नहीं जी कभी नहीं!

छम्मकछल्लो को अंग्रेजी आती नहीं. मगर अंग्रेजी अच्छी बहुत लगती है. अब अंग्रेजी न आने और पसन्द आने के बीच अप कोई तालमेल ना खोजें. हाथ तो चांद भी नहीं आता और हीरे का हार भी. तो इसका यह मतलब तो नहीं कि आप चांद या हार को पसन्द करना बन्द कर दें? आप यक़ीन क
 
Vibha Rani
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भाषा, बोली व लिपीयों का एक संवाद

हिन्दी-आर्य, द्रविड़, आस्ट्रो-एशियाटिक व तिब्बती-बर्मन चारों भाषा परिवारों के आह्वान पर हिन्दोस्तान के कोने-कोने से छोटी-बड़ी तमाम भाषाओं, बोलियो व लिपियो के लमही पहुचने का सिलसिला शुरू हो गया। ना जाने कितने बरसों बाद इनका मिलन हुआ, कई नये सदस्य अपने
 
परेश टोकेकर 'कबीरा'
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क्या हिंदी व्याकरण के कुछ नियम अप्रासंगिक हो चुके हैं?

सुयश सुप्रभ दिल्ली में रहते हैं और अनुवादक हैं। उनका एक ब्लाग है-अनुवाद की दुनिया, जिसके बारे में वे लिखते हैं... हिंदी को सही अर्थ में जनभाषा और राजभाषा बनाने के लिए सामूहिक प्रयत्न की आवश्यकता है। इस ब्लॉग में मैंने हिंदी पर अंग्रेज़ी के अनुचित दबा
 
अजित वडनेरकर
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राजनीतिक लाभ के लिए हिंदी का विरोध

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने अब राज्य विधानसभा पर भी मराठी का डंडा घुमाना शुरू कर दिया है। उन्होंने सभी नवनिर्वाचित विधायकों को धमकी दी है कि यदि उन्होंने मराठी के अलावा और किसी भाषा में सदन की सदस्यता की शपथ ली तो फिर देख लेंगे
 
डॉ. राधेश्याम शुक्ल
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हिंदी केवल एक भाषा नहीं, भारतीयता की अभिव्यक्ति है

हिंदी केवल एक भाषा नहीं, भारतीयता की अभिव्यक्ति है http://cmpershad.blogspot.com/2009/09/hindi-not-only-language.html#comments --डॉ. राधेश्याम शुक्ल, सम्पादक -स्वतंत्र वार्ता केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने सभी राज्य शिक्षा परिषदों [
 
डॉ. राधेश्याम शुक्ल
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सच्चाई क्या है [मातृभाषा-3]

पिछली कडियों में आपने पढ़ा- मातृभाषा से तात्पर्य उस भाषा से कतई नहीं है जिसे जन्मदायिनी मां बोलती रही है। मेरी नज़र में बच्चे का शैशव जहां बीतता है, उस माहौल मे ही जननि भाव है। जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएं सीख रहा है, वही महत्वपूर्ण है। यही उ
 
अजित वडनेरकर
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क्या है मातृभाषा का मतलब? [1]

मा तृभाषा शब्द को लेकर दुनियाभर में ज्यादातर लोग भ्रांति पालते हैं। अक्सर मातृभाषा शब्द का अभिप्राय उस भाषा से लगाया जाता है जिसे मां बोलती है। यह बहस हमारे परिवार में भी पिछले दिनों चली। अहिन्दीभाषी कहलाने के बावजूद हम सभी जन्म से हिन्दीभाषी हैं। मे
 
अजित वडनेरकर
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भारतीय साहित्य में दलित विमर्श : मणिपुरी समाज का संदर्भ

भारतीय सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में ’दलित’ से अभिप्राय उन लोगों से है जिन्हें जन्म, जाति या वर्णगत भेदभाव के कारण शताब्दियों तक सामाजिक न्याय और मानवाधिकार से वंचित रहना पड़ा है। मुख्य रूप से वर्ण व्यवस्था में शूद्र समझी जाने वाली जातियाँ, छुआछूत क
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दक्खिनी हिंदी की परंपरा : ‘ऐब न राखें हिंदी बोल’

तूँ कहाँ का है , इस जागाँ तूँ क्यों आया ? इस शहर को बाट तूँ क्यों पाया ? तुझे कौन दिखलाया ?’’ xxx ‘‘ सो उस दिलरुबा नार कूँ , दीदियाँ के सिंघार कूँ , चतुर चैसार कूँ , एक सहेली थी , भौत छबीली थी , रात रंगीली थी। नाँव उसका ज़ुल्फ़ था , लट साँवली निपट ,
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पानी की भी संख्या होती है भला?

जी हां,आप भी चौंक गये ना ? पानी को गिना जाना सम्भव नहीं है अत:पानी की संख्या नहीं होती. पानी का आयतन होता है या पानी की मात्रा होती है.यदि हमें 'बहुत ज्यादा ' पानी कहना हो तो कहेंगे कि पानी की मात्रा अधिक है. टी वी चैनलों की तो आजकल बाढ़ आयी हुई है .ज़ाहिर
 
अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi
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उलझा-उलझा है भाषाई परिदृश्य

फेसबुक के अपने मित्र सुयश सुप्रभ के ब्लॉग अनुवाद, हिंदी और भाषाओं की दुनिया पर उनका विचारोत्तेजक लेख क्या हम दुनिया की आधी भाषाओं को दम तोड़ते देखते रहेंगे तो लगभग् इसी विषय पर लिखा अपना एक थोड़ा पुराना लेख मुझे याद आ गया, जो अब भी प्रासंगिक है.18 मई
 
डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
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