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कल वो बीड़ी जलाती थी,आज से आप...जलाईए

बाजार भी कमाल की चीज है। कल तक जिस बीड़ी जलइएले.. गाती हुई,नंगी कमर को मटकाती हुई लड़की को देखकर देश के ठुल्ले तक अपने को रोक नहीं पाए,उस गाने का ऐसा असर कि अच्छों-अच्छों पर ठरक चढ़ जाए,आज उसी गाने के दम पर भक्ति पैदा करने के दावे किए जा रहे हैं। हिन्दी
 
विनीत कुमार
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अज्ञानता और अचिंतन का अन्धकार

ईश्वर, धर्म, अद्यात्म, आदि, यदि हम इन शब्दों को वर्तमान में प्रचलित अर्थों में लें, मानवता में अचिंतन के सूत्रपात सिद्ध होते हैं. ये सभी शब्द भारत के प्राचीन वेदों और शास्त्रों में पाए जाते हैं किन्तु वहाँ इनके अर्थ वर्तमान में प्रचलित अर्थों से भिन्न
 
देवसूफी राम कु० बंसल
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परम्पराओं का बोझ ढोते हम

स्वतंत्र समाजों में परम्पराएं अनुभवों से उद्भूत होती हैं किन्तु लम्बे समय तक गुलाम रहे देशों में परम्पराएं कृत्रिम रूप से भी थोपी जा सकती हैं. भारत में ऐसा बहुत अधिक हुआ है. परम्पराएं कुछ सीमा तक बुद्धि उपयोग को अवरोधित करती हैं, और प्रायः हम उन्ही बातों
 
देवसूफी राम कु० बंसल
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भारतीय समाज - विषमताओं का दंगल

आज का भारतीय समाज अनेक विषमताओं में निमग्न है किन्तु उनसे जूझने का दम उसमें कहीं दिखाई नहीं दे रहा है. व्यक्ति को सबसे पहले रोटी चाहिए बिना संघर्ष के, तभी वह आगे की सोच सकता है. जिस वर्ग को रोटी उपलब्ध नहीं है वह इसे पाने के प्रयासों में तल्लीन हैं और यह
 
देवसूफी राम कु० बंसल
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व्यंग्य : भर भंडोलाजी

भरभंडी माने होता क्या है, और कौन है ये भरभंडी मुनी? भरभंडी को समझने के लिये भोजपुरी के एक और मसल को देखें। मसल है कि 'ना खेलब ना खेले देब' (न खेलेंगे न खेलने देंगे, खेल को है बिगाड़ देंगे) इस मसल के लिए एक शब्द, 'भंडोल' या 'भरभंड' है। किसी भी खेल को भ
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बाल विवाह के खिलाफ उठी आवाज

वह दुख व्यक्त करते हुए कहती है कि किसी घर में लड़की की शादी कब होगी यह तो अमूमन मां-बाप ही तय करते हैं। लड़कियां चाहते हुए भी कुछ नहीं कर सकतीं। उसकी बेबसी साफ झलक रही थी।
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सामाजिक मर्यादाओं के संस्थापक श्वेतकेतु

श्वेतकेतु की संवदेना को दो घटनाओं ने बहुत ही ज्यादा आहत किया था। एक घटना के अनुसार उनके पिता के एक शिष्य ने उनकी मां के साथ दुर्व्यवहार की कोशिश की थी तो दूसरी घटना के अनुसार उन्हीं के एक मित्र ने उनसे उनकी पत्नी को एक पुत्र की प्राप्ति के निमित्त मा
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कहानी : पिया घर आये

प्रेमपूर्वक एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे कि अगर संसार में जीते हुए केवल यही काम उन्हें करना होता तो कोई भी धार्मिक पुस्तक उनमें मोक्ष की इच्छा पैदा नहीं कर सकती थी।
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कचरे से सोना बनाने की कला

न्यारगर या धूलधोया समाज के लोग देश के विभिन्न नगरों के सर्राफों और स्वर्णकारों से उनके परिसर की वर्ष भर में एकत्रित धूल को सबसे पहले खरीदते हैं। फिर उस धूल का शोधन कर उसमें जो भी सोने तथा चांदी के कण रहते हैं उन्हें वापिस प्राप्त करते हैं। धूलधोया ना
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कहानी : पीली धातु

हमारा परिवार केसला ब्लाक का रहने वाला है। पापा बताया करते थे कि बांध बनने पर हमारे सैकड़ों लोग वहां से हटा दिए गए थे। उनकी जमीनें छिन गई थीं, रोजी-रोटी का सहारा न रहा तो उन्हें जंगल के भीतर चले जाना पड़ा।