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रातोरात हो सकता है चमत्कार

चमत्कार का नाम तो आपने सुना होगा, चमत्कार को कई बार नमस्कार भी किया होगा। क्या आप नहीं चाहते कि आपके जीवन में कुछ चमत्कार हो? कोई कहे कि आपके जीवन में भी चमत्कार हो सकता है और बड़ी आसानी से हो सकता है, ठीक ऐसे जैसे आप पान की दुकान पर गए और दो-चार रुपये
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शुरू कीजिए काउंटडाउन

नया साल शुरू हो चुका है। इसके पांच दिन गुजर चुके। कल छठा दिन होगा, परसों सातवां, तरसों आठवां, फिर नौवां, दसवां और एक दिन निश्चित ही कोई दिन ऐसा भी होगा, जो इस साल का अंतिम दिन होगा। फिर शुरू होगा एक और नया साल। साल की शुरुआत से ही शुरू हो जाएगा उसके
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मेरी बीवी, मेरे बच्चे

एक जहीन सा वाक्य - मेरी बीवी, मेरे बच्चे। उनके इर्द-गिर्द ही तो मानव का जीवन संसार रचा-बसा होता है। मानव उनके कितना करीब होता है, हो सकता है या होना चाहिए, इस पर विचार व्यक्तित्व विकास और भविष्य की संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, ऐसा मुझे लगत
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ढलता सूरज धीरे-धीरे उगता है, उग आएगा

जी हां, भविष्य की संभावनाएं तलाश रहे हैं तो इस बात पर भी भरोसा करना सीखना होगा। जिस तरह से यह सत्य है कि ढलता सूरज धीरे-धीरे ढलता है, ढल जाएगा, ठीक उसी तरह यह भी सत्य है कि ढलता सूरज धीरे-धीरे उगता है, उग आएगा। यह जीवन का यथार्थ है। जो ढलता है, वह उग
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ढलता सूरज, धीरे-धीरे ढलता है, ढल जाएगा

जहां जड़ों में सबही नचावत राम गोसाई मजबूती से स्थापित हो और जन्म-जन्मांतर के रिश्ते-नाते का हर दिमाग कायल हो, वहां भविष्य को संवारने के लिए संभावनाओं की तलाश कर उस पर अमल करना थोड़ा दुश्वारी भरा तो हो सकता है, पर है जरूरी। जरूरी इसलिए कि जन्म-जन्मांत
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सब जज्बे की बात

व्यक्तित्व विकास पर चल रही सीरीज का यह पचासवां आलेख है। मेरे लिए तो यह बस एक आश्चर्य की ही बात है कि मैंने एक ख्याल पर्सनालिटी डेवलपमेंट पर उनचास लेख लिख दिए और पचासवां लिखने जा रहा हूं! क्या लिखूं यह सवाल नहीं है, न ही यह सवाल है कि कैसे लिखूं? सवाल
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लत, संगत, पंगत

चाहने वालों का आग्रह था, थोड़ा जल्दी-जल्दी लिखूं, कम समय अंतराल पर लिखूं। पर, देख लीजिए, इच्छा के बाद भी विलंब हुआ। क्यों हुआ, इस पर विचार करने बैठा तो जो तीन चीजें बातें छनकर आईं, उससे भविष्य को संवारने का ही सूत्र मिलता है। ये तीन चीजें हैं लत, संग
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फैलता-सिकुड़ता भविष्य

वक्त के दायरे में चाहे भविष्य ही क्यों न हो, जब फंसता है तो फैलता भी है और सिकुड़ता भी है। कैसे? दिल्ली जाने के लिए किसी ने बस पकड़ी, किसी ने ट्रेन तो कोई हवाई जहाज पर ही उड़ चला। तीन व्यक्ति का एक भविष्य दिल्ली पहुंचना वक्त के दायरे में कैसे फैला और
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फेट, ट्रस्ट, होप

मुझे याद आता है दुष्यंत की रचना का एक टुकड़ा। मैं बेपनाह अंधेरे को सुबह कैसे कहूं, मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं .....। कविता किसी दूसरे अर्थ में लिखी गयी है, पर मुझे इसका जो मतलब समझ में आता है, उसका नजारा कराना चाहूंगा। नजारों की नजर यह है कि जो
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मैं तूफान में भी चैन से सोता हूं....

आप कुछ कर रहे हैं औऱ आपका कलेजा कांप रहा है। क्या है इसका मतलब? मतलब साफ है कि कुछ न कुछ गलत है, कहीं न कहीं कमजोरी है। आप बोल रहे हैं और आपकी जुबां लड़खड़ा रही है। मतलब, या तो बोलना नहीं आता या जो बोल रहे हैं उसकी आपने तैयारी नहीं की है। जिंदगी के मुकाम
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फलक को जिद है जहां बिजलियां गिराने की....

संदर्भ भविष्य को संवारने का है, शुरुआत करता हूं एक शेर से। मुलाहिजा फरमाइए। शेर है - फलक को जिद है जहां बिजलियां गिराने की, हमें भी जिद है वहीं आशियां बनाने की। जब तक आप इस शेर की मस्ती को जज्ब करें, तब तक इसी के जेरेसाया मैं अपनी दो बात आपसे कह लूं। आप
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बाप की लाश और बेटी की परीक्षा

भविष्य की चिंताएं कैसे-कैसे फैसले कराती है, इसे मैंने देखा है और देखकर हैरान भी हुआ हूं। कुछ दृश्यों से आपको भी दो-चार कराना चाहूंगा। हो सकता है इन उदाहरणों से भविष्य और उसके मैकेनिज्म को समझने में आसानी हो और यह अनुभव किसी काम आ जाए।पहला उदाहरण - एक
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कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है

भविष्य सुधारने के लिए आप क्या करते हैं? सपने देखते हैं और उसे साकार करने की कोशिशें करते हैं। सपने साकार हुए तो अच्छा और टूट गये तो .....? डर यहीं होता है, घबराहट यहीं होती है। इलाहाबाद से मेरे एक मित्र श्री सतीश श्रीवास्तव ने सुझाया है कि भविष्य संवारने
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भविष्य को रिस्क चाहिए

जी हां, चिंता करने की नहीं, भविष्य बनाने की चीज है। आप चाहें तो आपका भविष्य बन सकता है, चाहें तो बिगड़ सकता है। भविष्य रिस्क है। जिसने रिस्क लिया, उसका भविष्य हमेशा उज्ज्वल रहा। जिसने रिस्क नहीं लिया. वह पड़ा रहा, सड़ता रहा। जिस भविष्य की चिंता में ह
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कुछ ऐसा भी है भविष्य का मैकेनिज्म

आदमी अनाम और शिशु के स्वरूप में जन्म लेता है। शिशु का भविष्य क्या है? उसका नामकरण, उसका लालन-पालन। फिर भविषय क्या है? उसका सही तरीके से पठन-पाठन। फिर क्या है? उसका रोजी-रोजगार। फिर क्या? शादी विवाह। फिर? बाल-बच्चे। इसके बाद ? अपने बच्चों का पालन-पोषण