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ऐसे नचनियाये, पिल्‍लाये समय में..

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. और इसी में ‘रावण’ रिलीज़ भी हो जाती है. पोस्‍टर पहले रिलीज़ हुई थी, तब कुत्ते शांत थे, मगर मैं तब भी सन्‍न हुआ था कि कागज़ पर ये लाल, पीले, नीले की अलग-अलग शोभा तो ठीक है, मगर जिस चेहरे के आसरे ये रंग मुखरित,
 
Pramod Singh
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तस्‍वीर बनाता हूं..

मगर बनती कहां है? कुछ भले, भोले लोग एक घर खड़ा करने की कोशिश करते हैं, पता चलता है कुछ समय बाद उन्‍हें बेदखल कर वह जगह इतिहास ने घर कर लिया है. ऊपर की तस्‍वीर बीसवीं सदी के शुरुआत में रमल्‍ला के एक किसान परिवार की है, यहां वीकीपीडिया से उठकर आई है..
 
Pramod Singh
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बिना शीर्षक..

‘कुछ तो होता होगा जो दिखता नहीं, मगर लौकी के बतिया को रोज़ कुछ बड़ा करता चलता है, नहीं?’ मौसा दन्‍न देना बोलते, बबुनी के बालों में हल्‍के हाथ फिराते हुए, फिर एकदम हंसने लगते. बबुनी चौंककर उनका चेहरा देखती, फिर खपड़े की लौकी पर, और आसपास, कि कहां जादू हुआ
 
Pramod Singh
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मन की बात..

रहते-रहते आती है जाने कहां से आती है, कि गहीन अंधारे सन्‍न् सुबेर हो जाता हूं, सिर नवाये, घबराये लजाये के कंगलई में कुबेर. बरसाती नाला-सा भहर बहा आता है, बेहयायी हंसी-बसी पुलकदायी खुशी में समूचा ढेर, मुलतानी पठान, विज्ञापन फ़ि‍ल्‍मों का बबर शेर हो जाता
 
Pramod Singh
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नक्‍सलवाद का जवाब है हमारे पास?

ऐसे में यह मज़ेदार है जब घेरे में फंसे दोनों पालों का देवों और दानवों में स्‍थूल विभाजन करके, देवों का पाला थामे दानवों के चिथड़े उड़ाये जा रहे हों, एक बुजुर्ग गांधीवादी ऐसी सन्-सन् फिजा में भी तटस्‍थता की चंद समझदार बातें करते दीखें. आप भी भरी हुई बंदूक
 
Pramod Singh
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काम न करने की एक बेमतलबी का चित्र..

फ़ोन पर आदमी खुद से बात कर रहा है, कैसे करें बताओ? फ़र्श पर तीन साल की बच्‍ची बुक्‍का फाड़े रो रही है, मानो आज रुदन-दिवस हो और वह पहले पुरस्‍कार की कैंडीडेसी का अपना केस बना रही हो. आदमी पहले बरजियाये, फिर रिरियाये इशारों से बच्‍ची को देखता है, कि ज़रा
 
Pramod Singh
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क्‍या होगा गरमी का असर होगा?

बहुत गर्मी झेलते रहने के बाद अभी झेलने को और गर्मी रहेगी. जैसे काफी कुछ पढ़ते रहने के बाद भी काफी कुछ पढ़ने को बचा, मुंह बिराता अपने में निस्‍संग बुदबुदाता दिखेगा. आलिफ़ बे से छूटे हुए फ़ैलन की डिक्‍शनरी लजाती और शास्‍त्रीयता से बाज आये बाबू हमें आलोक
 
Pramod Singh
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दो लिंक्स..

दो चीज़ें यहां अपने रेफ़रेंस के लिए टांक रहा हूं, पहली कुछ दिनों पहले गोरखपुर में फ़ि‍ल्‍मकार कुंदन शाह से की भूपेन की बातचीत है, भूपेन की बेतैयारी के सवालों का जहां कुंदन की ओर से दिया गया बड़े धीरज, सलीके और व्‍यापक संदर्भों को समेटे बड़ी समझदारी के
 
Pramod Singh
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गीक..

फेसबुक पर विनय का पोस्‍टेरस डॉट कॉम का एक इबो (ओगो, सोत्‍ती?) लिंक दिखा, पुरानी आदत के मारे, मुफ़्ति‍या माल दिखते ही तड़ देना हम जेब में साटे उड़ लिये. ( तस्‍वीर को बड़ाकार देखने के लिए तस्‍वीर पर चूहा ले जाकर उसे नये टैब में खोलें.)
 
Pramod Singh
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कोई मतलब बचा है? अख़बारों का?..

अख़बारों का अब भी कोई मतलब है? मतलब दूसरी जगहों में शायद बचा हुआ हो, मगर हमारे देश में? या वह महती प्रगतिशील हिन्‍दी साहित्‍य की तरह है, प्रकाशकों और पैसा कमानेवालों के लिए है, छपकर सुखी हो जानेवालों के लिए भी है , लेकिन पढ़ाने और समाज को कहीं आगे पह
 
Pramod Singh
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मुंबई ब्लॉगर-बैठकी, बोले तो .......होठों को करके गोल...... सीटी बजा के बोल..... ऑल इज वेल चाचू .....ऑल इज वेल :)

ब्लॉगर मिलन स्थल की ओर जाते समय जब जंगल-झाडी वाले डेढ किलोमीटर के सडक पर पैदल चल रहा था तो मन में ख्याल आया कि यार ये तो एकदम ही अलग अनुभव है।  ब्लॉगर मिलन और वह भी जंगल में। खूब हंसी ठिठोली होनी चाहिये अब तो।    याद आया मुझे फिल्म परि
 
सतीश पंचम
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एक सवाल..

हैं तो बहुत सारे , फ़ि‍लहाल इसी एक को आगे कर रहा हूं. एक भोली उम्‍मीद है दूसरे बहुत सारे आगे-पीछे इससे जुड़े चले आएंगे. कुछ पैसों के अनसुलझे, विहंगम रंगीन कैलेंडर हैं, बहुत सारा तो लगता है जैसे क्‍या मेरे जन्‍म के पहले के हैं- इधर मैंने जन्‍म लिया, उ
 
Pramod Singh
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कुएं के..

टर्र टर्र, टर्र टर्र टर्र टर्र, टर्र टर्र टर्र टर्र, टर्र टर्र टर्र टर्र, टर्र टर्र टर्र टर्र, टर्र टर्र टर्र टर्र, टर्र टर्र टर्र टर्र, टर्र टर्र टर्र टर्र, टर्र टर्र टर्र टर्र, टर्र टर्र टर्र टर्र, टर्र टर्र टर्र टर्र, टर्र टर्र टर्र टर्र, टर्र टर्
 
Pramod Singh
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फिकर नॉट, ब्लॉगिंग पर कब्जा रहेगा चिरकुटों का

एक दिन देखता हूँ, घर में काम करने वाली “बाई” ब्लॉगिया रही है कि फलाने ब्राण्ड का झाड़ू एकीदम बेकार किसम का है. हमारे साहबजादे भी ब्लॉग पर लिख रहे है. हर कोई, हर कहीं अपनी भाषा में ठेल रहा है, ठेलेगा और ठेलता रहेगा. क्या कर लोगे?
 
संजय बेंगाणी
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कैसी लिखाई, कहीं पहुंचाई?..

लिखो, लिखो, लिखते चले जाओ . चले जा ही रहे हैं, भौतिक रुप से कहीं पहुंच न रहे हों तो भी शब्दधन, और अंधारवन का विस्तारण तो हो ही रहा है! वैसे यह सवाल भी दिलचस्प है कि कहीं पहुंचना दरअसल कहां पहुंचना होता है? हो सकता है? कभी? उसकी एक्चुअल मार्किंग हो सक
 
Pramod Singh
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पठनीयता, लोकप्रियता, रुचि और विषयों की जानकारी देती फ़ीड आधारित साईट!

खुशी हो रही ये देख कर की हिंदी ब्लागर्स नये अनुप्रयोगों और जुगतों को अपनाने में बिल्कुल झिझक नहीं रहे – पिछली पोस्ट में एप्चर के बारे में बताने के बाद जैसी अप्रत्याशित प्रतिक्रियाएं मिलीं हैं – दिल बाग-बाग हुआ है. आज की पोस्ट है एक और धां
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ब्‍लू..

फ्रेंच डाक्‍टर , लेखक, दार्शनिक आनरी लाबोरित ने कहीं लिखा है ऐसे वक़्तों में ज़ि‍न्‍दा रहने और सपना देख सकने का इकलौता रास्‍ता यही है कि आदमी पलायन करे. मोटी-पतली किसी भी गली से 'निकल' ले. डाकसाहब ऐसे हल्‍के नहीं कि ऐसी हल्‍की बात करें, मगर कर रहे है
 
Pramod Singh
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इतना दांत मत चियारो, ससुर, कि मुंह का ओर-छोर पिराने लगे..

कुछ का कुछ पोत दूं? कहीं का कहीं जोत दूं? हिन्‍दी की हुशियारी, चौथी जमातवाली समझदारी पर बाल नोंच लूं? या नीलहा करीखा पोत लूं? सींग उगा लूं? या एह छोर से ओह छोर तक दांत चियारे गाल बजा लूं? भवकाल ठेल दूं? या ठिले हुए अकाल पर आलता का लाल? या जगजीत सिंग
 
Pramod Singh
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एक पोस्ट पर इत्ते टैग! दहाड़ कम, गूंज ज्यादा!!

काफी दिनों से देख रहा हूं कि कुछ ब्लॉगर छटांक भर की पोस्ट पर किलो भर के टैग लगा देते हैं। इधर पोस्ट का आकार तो बड़ा हो गया है, लेकिन टैग का वजन अब भी उस पर भारी पड़ता है। हो सकता है, ऐसे ब्लॉगरों की तादाद ज्यादा हो, लेकिन दो खास ब्लॉगरों पर मेरी नज़र
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मैं वही, वही बात, नया दिन, नयी रात..

डाऊनटाउन भले अपने में गुलज़ार, उमगता, सात एंगलों में सजता चलता हो, सबर्ब के कचर-मचर में उलझे, गोता लगाते हमारे जीवन में डाऊनवर्ड्स के तेज़ लीप्‍स जितने हों, टाउनवर्ड्स के कहां हैं. फिर (हमारे मन के ही अनुरूप) देह की चंचल विस्‍तारता व उपनगरीय रेलों की
 
Pramod Singh