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ख़त्म नही होती बात...

(हालिया प्रकाशित कुछ महत्वपूर्ण कविता संकलनों से असुविधा पर आपको रु ब रु कराने के वायदे के तहत हम इस बार प्रस्तुत कर रहे हैं ख्यात युवा कवि बोधिसत्व का ताज़ा संकलन 'ख़त्म नहीं होती बात'। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस संकलन का मूल्य है २०० रु। १९९१ में
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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कीर्ति चाहिए तो कुकूर बनिए

सन्दर्भ बताना ज़रूरी तो नहीं पर प्रबुद्ध पाठक समझ ही जायेंगे... इस बार पढ़िए बोधिसत्व की कविता ) मधुरी बानी बोल देस समूचा आज सेठों के हाथ में है... जो बचा है वो जेब में है काँख में है संस्कृति संगठन पर शोहदों का जाल है वे कुछ करते नहीं...देश का यही हाल
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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बोधिसत्व की कुछ नयी कवितायें

( बोधी भाई किसी परिचय के मुहताज़ नहीं हैं। बंबई और बालीवुड की गलियां भी इनकी सक्रियता को रोक नहीं पाई हैं। इस बार उन्हीं की कुछ कवितायें)चोरमैं दूसरों की बनाई दुनिया में रहासड़के जिन पर मैं चलाचप्पलें जो मैंने पहनींरोटियाँ जो मैंने खाईंसब थीं दूसरों की
 
अशोक कुमार पाण्डेय