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नये साल में "लोहे के घर" में यात्रा करते हुए एक कविता

कई दिनों के बाद यात्रा से लौटा हूँ ..मुम्बई गया था ,बीमार चाचा जी से मिलने । व्यस्तता और भागदौड़ कुछ ऐसी रही कि ब्लॉगर मित्रों से और कवि कथाकार मित्रों से मुलाकात ही नहीं कर पाया । जाते समय सोचता रहा कि सबसे मिलूंगा लेकिन यह सम्भव नहीं हुआ । यहाँ तक कि
 
शरद कोकास
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मैं ही

वो मैं ही तो था जिसके चीथड़े बटोरकर साफ कर रहे थे तुम जमीन मेरे ही कटे पांव को छापा था अखबार ने और मैं ही उसे देखकर कांप उठा था उस रोज सुबह मेरा ही खून बहा था सड़कों पर और मेरा ही खून चढ़ रहा था बोतलों से
 
Binod Ringania
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