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क्‍यों सोचें?

कई बार यही नहीं समझ आता कि हम क्या कर रहे हैं. वे क्या कर रहे हैं, समझना, ऐसे में मुश्किल नहीं जान पड़ता? अपना अमूर्तन हमेशा सुहाता है. उनका अमूर्तन भ्रम में डालता है. जैसे मेरी अमूर्त बातों को, मुंह बिचकाकर या बिराकर निकल लेते हैं आप लोग. लेखक तो हो