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मुक्तक 39

यदि हम सच्चे मन से देखें तो बहू और बेटी में कोईअंतर नहीं है.जो बेटी है वह दूसरे घर की बहू है और जो बहू है वह अपनी माँ की बेटी भी है. यदि हम इससत्य को जान लें तो बहू-बेटी के बीच का अंतर ही मिटजाएगा.जो बहू-बेटी में अंतर नहीं करते हैं और बहू को बेटी समझते
 
डा.मीना अग्रवाल
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कमाठीपुरा की गलियों से

शिरीष खरे, मुंबई से यह शहर के उठने का वक़्त है. बोरीबली से मुंबई सेंट्रल आने वाली लोकल के ठहरने के बीच का यह वक़्त, हजारों लोगों के दौड़ने का भी वक़्त है. मुंबई सेंट्रल से यात्रियों को अपने में समाए बेस्ट यानी ‘बॉम्बे एलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट’ की
 
CRY के दोस्त
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हड़ताल

हमरा बेटी का सिकायत था कि हम रोज एतना फालतू बात (घर का मुर्गी दाल बराबर) लिखते रहते हैं, कभी उसका बारे में नहीं लिखे. उसका गिलहरी जेरी का कहानी याद दिलाने पर बोली कि ऊ तो ट्रेजडी था. हम हँसकर बोले कि ठीक है, कभी मौका मिलेगा त लिखेंगे. अभी पिछलका हफ्ता
 
चला बिहारी ब्लॉगर बनने
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उनकी आधुनिकता को मैं धिक्कारती हूं

तसलीमा नसरीनपश्चिमी नारीवाद तो क्या प्राच्य के नारीवाद की भी मेरी खास समझ नहीं थी, लेकिन फिर भी बचपन से ही परिवार और समाज के अनेक उपदेशों और बंधनों को मैंने मानने से इनकार कर दिया या उन पर सवाल किए। मुझे जब बाहर मैदान में खेलने नहीं दिया जाता और मेरे
 
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अम्मा के सपने

मेरी अम्माबुनती थी सपनेकाश और बल्ले से,कुरुई, सिकहुलीऔर पिटारी के रूप में,रंग-बिरंगे सपने...अपनी बेटियों की शादी के,कभी चादरों और मेजपोशों परकाढ़ती थी, गुड़हल के फूल,और क्रोशिया सेबनाती थी झालरेंहमारे दहेज के लिये,खुद काट देती थीलंबी सर्दियाँएक शाल के
 
mukti
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लड़कियां कहां गायब हो रही हैं ?

शिरीष खरे2001 की जनगणना में हर समुदाय से जुड़ी हजारों संख्याओं का गुणा-भाग मौजूद है। नहीं मौजूद है तो इस सवाल का जवाब कि ऐसी संख्याओं के बीच से एक बड़ी संख्या में लड़कियां कहां गायब हो रही हैं ?1991 की जनगणना से 2001 की जनगणना तक, हिन्दु और मुसलमानों- दोनों
 
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पांच पंच मिल कीजै काज

शिरीष खरे बाड़मेर। राजौ और पूसाराम, एक ही दुनिया के दो किस्से हैं, दो किरदार हैं। इधर है अपनी अस्मत गंवा चुकी राजौ, जो गांव के विरोध पर भी अपनी अर्जी अदालत तक दे तो आती है, मगर लौटकर गांव से छूट जाती है। उधर है कमजोर दलित होने का दर्द झेलने वाला पूसार
 
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पांच पंच मिल कीजै काज

शिरीष खरे बाड़मेर। राजौ और पूसाराम, एक ही दुनिया के दो किस्से हैं, दो किरदार हैं। इधर है अपनी अस्मत गंवा चुकी राजौ, जो गांव के विरोध पर भी अपनी अर्जी अदालत तक दे तो आती है, मगर लौटकर गांव से छूट जाती है। उधर है कमजोर दलित होने का दर्द झेलने वाला पूसार
 
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एक बार फिर दुविधा ! ४५

फरवरी २००७....इस माह के तकरीबन अंत मे मै मुंबई गयी थी। इसी माह के शुरुआत मे मुझे एक बड़ा अल्हाद्कारक निमंत्रण मिला...नाशिक से...एक ऐसी महिला से, जो मेरी सन १९८२ मे विद्यार्थिनी रह चुकी थी....हमारे औरंगाबाद के दिनों मे....मेडिसिन की पढ़ाई कर रही थी लेकि
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