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अब बेटियां बोझ नहीं!

छछम्मक्छल्लो को अभी तक याद है, वह उनकी दूसरी बेटी थी, जिसके जनम के समय वह वहां थी. पहली संतान भी बेटी थी. अभी भी कई घरों में दो बेटियां स्वीकार कर ली जाती थीं. वहां भी स्वीकार ली गईं कि साल भर बाद फिर से उनके मां बनने की खबर आई. समझ में आ गया कि इस तीसरी
 
Vibha Rani
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सरकारी अफसर हैं तो क्या हुआ?

सरकार भी न! अजीबोगरीब कायदे-कानून बनाती रह्ती है. एक नियम बना कर पाबंदी लगा दी कि सरकारी नौकरियों में अधिकतम दो बच्चों को ही जन्म दिया जा सकता है. पाबंदी इस अर्थ में कि इन नौकरियों को करनेवाले कर्मचारियों को सरकार की ओर से दी जानेवाली सुविधाएं केवल दो
 
Vibha Rani
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मेरी बच्ची

तुझे दूँगी वो सारी खुशियाँ जो मुझे नहीं मिलीं तेरी ज़िन्दगी को ऐसे मैं संवारुँगी तुझे रखूँगी पलकों की छाँव में ग़म की हर धूप से बचा लूँगी कैसे बचाउँगी शैतानों की नज़रों से तुझे अभी से सोचकर डर लगता है कि मेरी ही तरह तुझे भी जाने क्या-क्या सहना होगा प
 
mukti
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बड़ी होती हुयी लड़की

अपने ही घर में वह डरती है /और अंधेरे में नहीं जाती /हर पल उसकी आँखों में /रहता है खौफ का साया /जाने किस खतरे को सोचकर /अपने में सिमटी रहती है /रास्ते में चलते -चलते /पीछे मुड़कर देखती है /बार -बार /और किसी को आता देख /थोड़ा किनारे होकर /दुपट्टे को सीन
 
mukti