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मेरा और वाणी का ........बुढ़ापा

वैसे तो हमारा (मेरा और वाणी) का बुढ़ापा आने से रहा, अरे हम जैसों को बुढ़ापा कहाँ आता है, वो भी तो बेचारा घबराता होगा (मतलब हमें ऐसा लगता है...ये हमारी खुशफहमी भी हो सकती है :):))  फिर भी अगर भूले भटके...बुढ़ापे को हमारे बिना दिल ना लगा...और आ ही जाए तो
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बुढ़ापे का सन्नाटा कैम्पस

बुढ़ापे के सन्नाटे कैम्पस मेंप्रतिदिन सिकुड़ते माँ-बाप का वज़न इतना कैसे हो जाता हैकि बोझ लगने लगते हैं वे...वो--जिसके पास हो डायटिंग की ऐसी तकनीक जो कम कर सके बोझ लगने वाला यह एकस्ट्रा फ़ैटमुझे तलाश हैएक ऐसे डॉक्टर की.
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आज सुबह की उजली धूप में अतीत के पन्ने सुखा रहा था जो बेवजह ही रात के तन्हाई में गीले हो गए थे.

ज़माने के साथ न चल पाना और outdated का लेबल चस्पा हो जाना बचपन से मेरी नियति रहा है....चाहे वो गाँव की टूटी पुलिया पर बैठकर दोस्त उमेश के पावन प्रेम की प्रगति रिपोर्ट सुनना हो या फिर गोविंदा के नृत्य शैली पर दोस्तों का तारीफों के पुल बांधना। ख़ुद को हमेशा
 
अजीत 'फिरदौस'