पसंद करें
0
नापसंद करें

पैने दांतों वाली

बिना किसी लाग लपेट के अब कुछ कहने को जी करता है सच कहने को जी करता है हाँ अब तो बस सच कहने को जी करता है......... १९७३ में लिखी बाबा नागार्जुन की '' पैने दांतों वाली'' कविता काफी मशहूर हुई थी| यह कविता उस दौर की राजनीतिक अशांति और उस अशांति के बीज से
 
श्वेतकेतु
पसंद करें
0
नापसंद करें

मार्क्स, धर्म और ईश्वर के बीच

मार्क्स ने कहा था धर्म अफीम है। लेनिन ने कहा था धर्म केवल एक निजी मामला नहीं है। आज हमारे बीच न मार्क्स हैं न लेनिन। मगर धर्म है। मार्क्स और लेनिन के सिद्धांत पुराने पड़ चुके हैं, मगर धर्म पुराना होकर भी खत्म नहीं हुआ। यह निरंतर फैल रहा है। या कहें हम
 
अंशुमाली रस्तोगी