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तिनका-तिनका बिखर कर

यह सच है कि जब भी मेरे अपनों नेबहुत अपनों ने आघात कियातिनका-तिनका बिखर गई मैंअनगिनत दिशाओं मेंऔर अनगिनत दर्द उपजेमेरे मन के अनगिनत कोनों से...पर यह भी सच है कि जहाँ-जहाँ गिरेयह अनगिनत तिनकेहमेशा ही अंकुर फूटेनए-नए पौधों के...सृष्टि रचने की अपनीशक्ति और