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मम्मी मेरी सबसे प्यारी (बाल-गीत)

मम्मी मेरी सबसे प्यारी,मैं मम्मी की राजदुलारी।मम्मी प्यार खूब जताती,अच्छी-अच्छी चीजें लाती।करती जब मैं खूब धमाल,तब मम्मी खींचे मेरे कान।मम्मी से हो जाती गुस्सा, पहुँच जाती पापा के पास।पीछे-पीछे तब मम्मी आती,चाॅकलेट देकर मुझे मनाती।थपकी देकर लोरी
 
Akanksha~आकांक्षा
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मम्मी मेरी सबसे प्यारी

मम्मी मेरी सबसे प्यारी,मैं मम्मी की राजदुलारी।मम्मी प्यार खूब जताती,अच्छी-अच्छी चीजें लाती।करती जब मैं खूब धमाल,तब मम्मी खींचे मेरे कान।मम्मी से हो जाती गुस्सा, पहुँच जाती पापा के पास।पीछे-पीछे तब मम्मी आती,चाॅकलेट देकर मुझे मनाती।थपकी देकर लोरी
 
KK Yadava
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“नाच रहा जंगल में मोर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

देख-देख मन हुआ विभोर। नाच रहा जंगल में मोर।। चंचल-चपला चमक रही है, बादल गरज रहा घनघोर। नाच रहा जंगल में मोर।। रूप सलोना देख मोरनी, के मन में है हर्ष-हिलोर। नाच रहा जंगल में मोर।। नीलकण्ठ का नृत्य हो रहा, पुरवा मचा रही है शोर। नाच रहा जंगल में मोर।।
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“होली का आया त्यौहार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

प्राची गुझिया बना रही है, दादी पूड़ी बेल रही है।   कभी-कभी पिचकारी लेकर, रंगों से वह खेल रही है।। तलने की आशा में आतुर गुझियों की है लगी कतार। घर-घर में खुशियाँ उतरी हैं, होली का आया त्यौहार।। मम्मी जी दे दो खाने को, गुझिया-मठरी का उपहार। सजता
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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"भारत देश हमारा प्यारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

बाल-गीत भारत देश हमारा प्यारा। सब देशों से है यह न्यारा्।। गिरजाघर में प्रभु का गान। मस्जिद में हो रही अजान।। कथा हो रही चौबारों में। गुरूवाणी है गुरूद्वारों में।। मन्दिर में हो रही आरती। धन्य-धरा हो रही भारती।। पण्डित जी घिसते हैं चन्दन। सबके अपने
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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बाल-गीत चिंकी चुहिया आचार्य संजीव 'सलिल'

बाल-गीत चिंकी चुहिया चिंकी चुहिया चीन्ह-चीन्ह कर. कपड़े कुतरे इधर-उधर. दरजी दादा तंग हुए. परेशान-बेरंग हुए. सूझा उनको एक उपाय. जिससे यह बलाय टल जाए. मोटी बिल्ली पाली एक. मार सके चुहिया, दे फेंक. म्याऊँ बिल्ली गुर्राई. चुहिया की शामत आयी. बिल में दुबक
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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‘‘भँवरा’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

गुन-गुन करता भँवरा आया। कलियों- पुष्पों पर मंडराया ।। यह गुंजन करता उपवन में। गीत सुनाता है कानन में।। कितना काला इसका तन है। किन्तु बड़ा ही उजला मन है।। जामुन जैसी शोभा न्यारी। खुशबू इसको लगती प्यारी।। यह फूलों का रस पीता है। मीठा रस पीकर जीता है।। (
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘पतंग का खेल’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

लाल और काले रंग वाली, मेरी पतंग बड़ी मतवाली। मैं जब विद्यालय से आता, खाना खा झट छत पर जाता। पतंग उड़ाना मुझको भाता, बड़े चाव से पेंच लड़ाता। पापा-मम्मी मुझे रोकते, बात-बात पर मुझे टोकते। लेकिन मैं था नही मानता, इसका नही परिणाम जानता। वही हुआ था, जिसका डर
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक