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आए जब दो पाखी उड़कर : रावेंद्रकुमार रवि का नया बालगीत

आए जब दो पाखी उड़करमेरे घर में बना एक घर,आए जब दो पाखी उड़कर!मादा ने दो अंडे देकर,गरम किया फिर उनको सेकर!कुछ दिन बाद निकलकर आए,उसके दो बच्चे मन भाए!चोंच खोलकर चुग्गा खाते,पर उनके ना निकले थे पर!मेरे घर में ... ... .माँ आती जब चुग्गा लेकर,हल्ला करते
 
रावेंद्रकुमार रवि
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पेड़ लगाकर भूल न जाना : रावेंद्रकुमार रवि का नया बालगीत

पेड़ लगाकर भूल न जानाआओ, हम सब पेड़ लगाएँ,अपनी धरती ख़ूब सजाएँ!पेड़ लगाकर भूल न जाना,इनको पानी रोज़ पिलाना!रोज़ सवेरे इन्हें चूमकर,बहुत प्यार से फिर सहलाना!इन पर बैठ सदा चिड़ियाएँ,गीत ख़ुशी के हमें सुनाएँ!आओ, हम सब ... ... .पेड़ों को भाती है मस्ती,इनकी
 
रावेंद्रकुमार रवि
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आओ, नाचें ता-ता-थइया : श्याम सखा श्याम का बालगीत

आओ, नाचें ता-ता-थइया!बादल भइया, बादल भइया,आओ, नाचें ता-ता-थइया!बंद पड़ी दादुर की टर-टर,बहे पसीना झर-झर-झर-झर!बछिया ढूँढ रही है मइया!बादल भइया, बादल भइया, आओ, नाचें ता-ता-थइया!पिहू-पिहू कर मोर पुकारे -आजा-आजा बादल प्यारे!सूखे हैं सब ताल-तलइया!बादल भइया,
 
रावेंद्रकुमार रवि
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अपनी माँ का मुखड़ा : रावेंद्रकुमार रवि का एक बालगीत

♥♥अपनी माँ का मुखड़ा मुझको सबसे अच्छा लगता - अपनी माँ का मुखड़ा! कल-कल करती नदिया अच्छी, पंछी की सुरलहरी अच्छी, हर मंदिर की घंटी अच्छी, मेघों की सरगम भी अच्छी! लेकिन मुझको अच्छी लगती - अपनी माँ की मीठी
 
रावेंद्रकुमार रवि
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मैं भी पढ़ना सीख रही हूँ : आकांक्षा यादव का नया बालगीत

मैं भी पढ़ना सीख रही हूँमैं भी पढ़ना सीख रही हूँ,ताकि पढ़ सकूँ मैं अखबार।सुबह-सवेरे मेरे द्वार,हॉकर लाता है अखबार।कभी नहीं वह नागा करता,शीत पड़े या पड़े फुहार।मैं भी ... ... .दादा जी का हो जाता है,आते ही पहले अखबार।चश्मा ऊपर-नीचे करके,पढ़ते वे दुनिया का
 
रावेंद्रकुमार रवि
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"सब्जी-मण्डी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

देखो-देखो सब्जी-मण्डी, बिकते आलू,बैंगन,भिण्डी।कच्चे केले, पक्के केले,मटर, टमाटर के हैं ठेले।गोभी,पालक,मिर्च हरी है,धनिये से टोकरी भरी है।लौकी, तोरी और परबल हैं,पीले-पीले सीताफल हैं।अचरज में है जनता सारी,सब्जी-मण्डी कितनी प्यारी।(चित्र गूगल सर्च से साभार)
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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मेरी शोभा प्यारी है : रावेंद्रकुमार रवि का नया बालगीत

मेरी शोभा प्यारी है! मेरे आगे फीकी सारे, रंगों की पिचकारी है! मुझको पाकर सरसा करती, बगिया की हर क्यारी है! मैं जब खिलता हूँ मुस्काकर, सज जाती फुलवारी है! मेरे-जैसी बस दुनिया में, बच्चों की किलकारी है! मेरे अंदर ख़ुशबू भी है, सुंदरता भी न्यारी है! मैं
 
रावेंद्रकुमार रवि
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“मदारी का खेल : रानीविशाल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

"एक खेल मदारी का" डम-डम, डम-डम डमरू बाजा। उछला-कूदा, छुटकू राजा।।खाना खाकर ताजा-ताजा।ठुमक-ठुमककर छुटकू नाचा।।वानर-राजा खेल दिखाते।बच्चे तालीखूब बजाते।। छुटकी को कर रहा  इशारा।लगता सबको कितना प्यारा।।अब छुटकी भी उठकर आई।खेल-खेल में धूम
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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"कम्प्यूटर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

 यह मेरा कम्प्यूटर प्यारा,इसमें ज्ञान भरा है सारा।भइया इससे नेट चलाते,नई-नई बातें बतलाते।यह प्रश्नों का उत्तर देता,पल भर में गणना कर लेता। माउस, सी.पी.यू, मानीटर,मिलकर बन जाता कम्प्यूटर।इसमें ही की-बोर्ड लगाते,जिससे भाषा को लिख पाते।नया जमाना अब है
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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हो... हो... होली है : अरविंद राज का एक बालगीत

हो... हो... होली है ! मन में तरंग है, तन में उमंग है । धरती रंगीली है, अंबर सतरंग है । रंगों में रँगी हुई मस्तों की टोली है । होली है... हो... हो... होली है !आज नहीं दिल में है कोई मलाल । छेड़ रहे सब मिलकर खुशियों की ताल । रंगों में आज भली प्रेम-भंग घोली
 
रावेंद्रकुमार रवि
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“आई होली! आई होली!!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आयी होली, आई होली।रंग-बिरंगी आई होली।मुन्नी आओ, चुन्नी आओ, रंग भरी पिचकारी लाओ,मिल-जुल कर खेलेंगे होली।रंग-बिरंगी आई होली।।मठरी खाओ, गुँजिया खाओ, पीला-लाल गुलाल उड़ाओ,मस्ती लेकर आई होली।रंग-बिरंगी आई होली।। रंगों की बौछार कहीं है,ठण्डे जल की धार कहीं
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“संगीता स्वरूप का बालगीतः रेल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”

“छुक-छुक करती आई रेल!”छुक-छुक करती आई रेल!आओ मिलकर खेलें खेल!! लालू-ममता जल्दी आओ! आकर के डिब्बा बन जाओ!! खूब चलेगी अपनी रेल! आओ मिलकर खेलें खेल!! गुड्डी आई पिंकी आई! लाल हरी झण्डी ले आई!! लगी रेंगने अपनी रेल! आओ मिलकर खेलें खेल!! इंजन चलता आगे-आगे!
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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श्रम करने से मिले सफलता : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" का एक बालगीत

बालगीत : परीक्षा सिर पर आई के लिए "सरस पायस" को आशीष के रूप में मिला डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" का बालगीत इतना अच्छा है कि मैं उसे पोस्ट के रूप में प्रकाशित करने से अपने आप को रोक नहीं पाया!श्रम करने से मिले सफलताखेल-कूद में रहे रात-दिन, अब पढ़ना
 
रावेंद्रकुमार रवि
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‘‘मेरी गैया’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मेरी गैया बड़ी निराली, सीधी-सादी, भोली-भाली। सुबह हुई काली रम्भाई, मेरा दूध निकालो भाई। हरी घास खाने को लाना, उसमें भूसा नही मिलाना। उसका बछड़ा बड़ा सलोना, वह प्यारा सा एक खिलौना। मैं जब गाय दूहने जाता, वह अम्मा कहकर चिल्लाता। सारा दूध नही दुह लेना,
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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परीक्षा सिर पर आई : रावेंद्रकुमार रवि का एक बालगीत

परीक्षा सिर पर आई खेल-कूद अब छोड़ें कुछ दिन,आओ, जमकर करें पढ़ाई!परीक्षा सिर पर आई!! टीवी-सीडी ख़ूब देख ली,ख़ूब किया है सैर-सपाटा!अब तो केवल देखें पुस्तक,छोड़ें सुस्ती की अँगड़ाई!परीक्षा सिर पर आई!! गणित हमारी माता हैं अब,और पिता विज्ञान हमारे!इनकी सेवा अब भी
 
रावेंद्रकुमार रवि
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“भगवान एक है!" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मन्दिर, मस्जिद और गुरूद्वारे। भक्तों को लगते हैं प्यारे।। हिन्दू मन्दिर में हैं जाते। देवताओं को शीश नवाते।।ईसाई गिरजाघर जाते। दीन-दलित को गले लगाते।। जहाँ इमाम नमाज पढ़ाता।मस्जिद उसे पुकारा जाता।।सिक्खों को प्यारे गुरूद्वारे। मत्था वहाँ टिकाते
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“संगीता स्वरूप का बालगीत” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“चूहे की होली”  चूहा  खेल रहा था होली। रंगो की लेकर रंगोली।।भर पिचकारी उसने मारी। बिल्ली  मौसी भीगी सारी।।अब बिल्ली को गुस्सा आया। उसने चूहे को धमकाया।।चूहा थर-थर काँप रहा था।  डरकर माफ़ी  मांग रहा था।।हंस कर तब बिल्ली ये
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“भैया! मुझको भी, लिखना-पढ़ना, सिखला दो!”(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“भैया! मुझको भी, लिखना-पढ़ना, सिखला दो!”भैया! मुझको भी,लिखना-पढ़ना, सिखला दो।क.ख.ग.घ, ए.बी.सी.डी, गिनती भी बतला दो।।पढ़ लिख कर मैं, मम्मी-पापा जैसे काम करूँगी।दुनिया भर में, बापू जैसा अपना नाम करूँगी।।रोज-सवेरे, साथ-तुम्हारे, मैं भी उठा करूँगी।पुस्तक लेकर
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“बाल-गीत” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

हाथी दादा सूंड उठा कर,चले देखने मेला। बन्दर मामा साथ हो लिया,बन करके उनका चेला। चाट पकौड़ी खूब उड़ाई,देख चाट का ठेला। बड़े मजे से फिर दोनों ने,जम करके खाया केला। अब दोनों आपस में बोले, अच्छा लगा बहुत मेला।(चित्र गुगल सर्च से साभार)
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मान्या की दादी का एक बालगीत : पीछे-पीछे सब डिब्बों से

गिरिजा कुलश्रेष्ठ पीछे-पीछे सब डिब्बों सेनन्ही मान्या घुटनों-घुटनोंचलती किलक-किलककर!उसे पकड़ने दौड़ पड़ा हैपीछे-पीछे सब घर! चश्मा रखकर दौड़ीं दादी,पुस्तक रखकर दादा,हड़बड़-गड़बड़ पापा-मम्मी,काम छोड़कर आधा,चकराए चाचा चिल्लाए --रोको, अरे, सँभलकर!नन्ही
 
रावेंद्रकुमार रवि
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कह रहीं बालियाँ गेहूँ की : डॉ॰ नागेश पांडेय संजय का एक बालगीत

कह रहीं बालियाँ गेहूँ की मधुर कान में काली कोयल गाए मस्त मल्हार!बाँट रहे हैं फूल सभी को ख़ुशबू का उपहार!पेड़ों ने पहनी है कोमल-नई-मनोहर वर्दी!भीनी-भीनी धूप निकलने लगी कम हुई सर्दी! लदे बौर से पेड़ आम के मस्त हवा संग झूमें!सुध-बुध छोड़ तितलियाँ सरसों पर
 
रावेंद्रकुमार रवि
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‘‘मेरा कुत्ता बड़ा निराला’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

लम्बे-लम्बे कानों वाला।मेरा कुत्ता बड़ा निराला।।घर की रखवाली करता है।नही किसी से यह डरता है।।प्यारा सा है इसका नाम।सब कहते हैं इसको टाम।।खीरा, आम चाव से खाता।सेव, टमाटर चट कर जाता।।नित्य नियम से हमें जगाता।भौं-भौं कर आवाज लगाता।।प्राची को लगता यह
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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उनको सदा नमन हैं करते : डॉ. श्याम गुप्त का एक बालगीत

उनको सदा नमन हैं करते सरस्वती माँ की हे बच्चो,क्यों हम सब पूजा करते हैं?इनके हंस-मोर हैं कैसे?क्यों बैठीं ये श्वेत कमल पर?माँ के कर में वीणा क्यों है?श्वेत वस्त्र क्यों धारण करतीं?माला-पुस्तक लिए हाथ में, क्या हमको समझाती रहतीं?जैसे जल ना टिके
 
रावेंद्रकुमार रवि
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लगी झूमने फिर खेतों में : डॉ॰ देशबंधु शाहजहाँपुरी का एक बालगीत

लगी झूमने फिर खेतों मेंकुहू-कुहूकर कोयल सबको मधुरिम गीत सुनाती!फूलों के चेहरों पर खिलकर मुस्काहट सज जाती!!मस्त पवन के साथ महककर झूम उठी हरियाली!पीपल के पत्तों ने मिलकर ख़ूब बजाई ताली!!बगिया में गेंदा-गुलाब संग सभी फूल मुस्काते!मतवाले भँवरे गुंजनकर
 
रावेंद्रकुमार रवि
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“ओह…आज तो भयंकर कुहरा है!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

ये हैं जी! खटीमा में आज सुबह 8 बजे के दृश्य आठ बजे है बहुत अंधेरा, देखो हुआ सवेरा! सूरज छुट्टी मना रहा है, कुहरा कुल्फी जमा रहा है, गरमी ने मुँह फेरा!देखो हुआ सवेरा! भूरा-भूरा नील गगन है, गीला धरती का आँगन है, कम्बल बना बसेरा! देखो हुआ सवेरा! मूँगफली के
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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रंग-रँगीली : कृष्णकुमार यादव का एक बालगीत

रंग-रँगीली चिड़िया रानी चूँ-चूँ करके सबको सुबह जगाती है! रंग-रँगीली चहक-चहककर सबका मन हर्षाती है! आँगन में बिखरे दानों को फुदक-फुदककर खाती है! अगर पकड़ने दौड़ो उसको झट से वह उड़ जाती है! जितना भी दौड़ें हम बच्चे, उतना हमें छकाती है! फुर्र-फुर्रकर आसमान
 
रावेंद्रकुमार रवि
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महके हृदय तुम्हारा : रावेंद्रकुमार रवि का मन महकाता गीत

रावेंद्रकुमार रविमहके हृदय तुम्हारानए वर्ष की नई सुबह में फूटी रवि की नव किरणों-से चमकें स्वप्न तुम्हारे!होकर फिर साकारकरें जीवन उजियारा,ख़ुशियों की सुगंध सेमहके हृदय तुम्हारा! रावेंद्रकुमार रविराजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, चारुबेटा, खटीमा,
 
रावेंद्रकुमार रवि
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बातचीत : भगवान से - रावेंद्रकुमार रवि का एक बालगीत

रावेंद्रकुमार रवि हम शोभा बन जाएँ हे ईश! तुम्हारा हर पल हम गुण गाए ँ ! हमको ऐसे ज्ञान-दीप दो , कभी न जो बुझ पाए ँ ! हे ईश! तुम्हारा ... ... ... ... ... ... ... आए ँ जितनी भी बाधाए ँ , सबका भंजन कर दें! हर निराश मन में आशा का सुमधुर गुंजन भर दें! नवकल
 
रावेंद्रकुमार रवि
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आज से "सरस पायस" पूरी तरह से बच्चों का

आज बाल-दिवस है!   आज से " सरस पायस " पूरी तरह   से बच्चों का है!   अब इस पर प्रकाशित होनेवाली समस्त सामग्री  बच्चों से ही संबंधित हुआ करेगी! दुनिया के सभी बच्चों को सरस प्यार! जिनके जन्म-दिन पर बाल-दिवस मनाया जाता है,  उनसे स
 
रावेंद्रकुमार रवि
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उनको सदा नमन हैं करते : डॉ. श्याम गुप्त का एक बालगीत

उनको सदा नमन हैं करते   सरस्वती माँ की हे बच्चो, क्यों हम सब पूजा करते हैं? इनके हंस-मोर हैं कैसे? क्यों बैठीं ये श्वेत कमल पर? माँ के कर में वीणा क्यों है? श्वेत वस्त्र क्यों धारण करतीं? माला-पुस्तक लिए हाथ में,  क्या हमको समझाती रहतीं? जै
 
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श्याम सखा श्याम का बालगीत : आओ, नाचें ता-ता-थइया!

आओ, नाचें ता-ता- थइया ! बादल भइया, बादल भइया, आओ, नाचें ता-ता- थइया ! बंद पड़ी दादुर की टर-टर, बहे पसीना झर-झर-झर-झर! बछिया ढूँढ रही है मइया! बादल भइया, बादल भइया, आओ, नाचें ता-ता- थइया ! पिहू-पिहू कर मोर पुकारे - आजा-आजा बादल प्यारे! सूखे हैं सब ताल
 
रावेंद्रकुमार रवि
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बगिया में मुस्काते फूल : रावेंद्रकुमार रवि का एक बालगीत

बगिया में मुस्काते फूल अंजलि भर-भर प्यार लुटाते - बगिया में मुस्काते फूल! ख़ुशबू का उपहार बनाते - बगिया में मुस्काते फूल! तितली को हैं खूब रिझाते - बगिया में मुस्काते फूल! भौंरे का भी मन बहलाते - बगिया में मुस्काते फूल! हरदम ख़ुश रहना सिखलाते - बगिया
 
रावेंद्रकुमार रवि
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पतलूजी बेचारे : नेहा गुप्ता अंजू का एक बालगीत

पतलूजी बेचारे सिर पर अपने टोपी धरकर , पतलूजी निकले घर से ! बच्चों ने घेरा जब उनको , लगे काँपने वे डर से ! हाथ जोड़ बोले - " रँगना मत , बहुत कीमती है टोपी !" पर बच्चों ने एक न मानी , रंगों से रँग दी टोपी ! पतलूजी भागे बेचारे , सिर पर धरकर पैर ! कान पकड़
 
रावेंद्रकुमार रवि
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लगी झूमने फिर खेतों में : डॉ॰ देशबंधु शाहजहाँपुरी का एक बालगीत

लगी झूमने फिर खेतों में कुहू-कुहूकर कोयल सबको मधुरिम गीत सुनाती! फूलों के चेहरों पर खिलकर मुस्काहट सज जाती!! मस्त पवन के साथ महककर झूम उठी हरियाली! पीपल के पत्तों ने मिलकर ख़ूब बजाई ताली!! बगिया में गेंदा-गुलाब संग सभी फूल मुस्काते ! मतवाले भँवरे गुं
 
रावेंद्रकुमार रवि
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माकडाचा मोबाईल

माकडाचा मोबाईल - एक बालगीत एक माकड घेऊन आले एकदा मोबाईलकलरफुल डिस्प्ले होता, लेटेस्ट होती स्टाईलस्कीनसेव्हर त्याचा होता बाल हनुमानरींगटोन म्हणून सेट केले जंगलबुकचे गानमाकड पुसे वापरायचाय का तुम्हाला हा फोनएका कॉलला तीन रुपये एस. एम. एस. ला दोनदुसऱ्या
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ससोबांचे ऑपरेशन

एक होता ससात्याने खाल्ला मासाकाटा अडकला घशातपाणी आले डोळ्यातडॉक्टर बनून कोल्होबा आलेऑपरेशन करावे लागेल म्हणालेससोबांचे झाले ऑपरेशनअन कोल्होबांचे जेवण.