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प्लेटफार्म पर भटकता बचपन-------------[मिथिलेश दुबे]

उसके पापा की साइकिल मरम्मत की दुकान थी, आमदनी ज्यादा नहीं थी, सो पापा ने उसे बनारसी साङियों की एक फैक्टरी मे काम करने भेजा ,तब वह महज ८-९ साल का था।छोटा होने की वजह से हाथो की पकङ मजबूत नही थी, नतीजन साङी मे दाग छूट गया , इस बात पर गुस्साये ठेकेदार न
 
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बाल दिवस पर चच्चा, दादा और परदादा से भेंट

आज सुबह-सुबह बच्चों को ‘हैप्पी चिल्ड्रेन्स डे’ बोलकर ऑफिस गया तो इस वादे के साथ कि शाम को कहीं घुमाने ले जाएंगे। आज ‘सेकेण्ड सैटर्डे’ के कारण ट्रेजरी में काम कम होने की उम्मीद थी। मन में खुशी थी... जल्दी लौट आऊंगा और बच्चों की ख़्वाहिश पूरी करने और अप
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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प्लेटफार्म पर भटकता बचपन-------------[मिथिलेश दुबे]

उसके पापा की साइकिल मरम्मत की दुकान थी, आमदनी ज्यादा नहीं थी, सो पापा ने उसे बनारसी साङियों की एक फैक्टरी मे काम करने भेजा ,तब वह महज ८-९ साल का था।छोटा होने की वजह से हाथो की पकङ मजबूत नही थी, नतीजन साङी मे दाग छूट गया , इस बात पर गुस्साये ठेकेदार न
 
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