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एक कदम पर्यावरण और हमारे लिए

   नन्हा पौधा  हरा हरा एक नन्हा पौधा , लगा  मेरे  उपवन में |  जिसे देख कर फूल ख़ुशी के  खिलते जाते मेरे मन में   |धूप यह खाता , पीता पानी
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सच हुआ सपना ....(बाल साहित्य)..........मोनिका गुप्ता

सपने वो नही जो सोते समय देखे जाए ... सपने वो हैं जो हमे सोने ही ना दें ...कुछ ऐसा ही सपना लिए हरियाणा के पानीपत का कनिक गुप्ता अपनी +2 की पढाई के साथ साथ आईआईटी और एआईईईई की पढाई मे जुटा हुआ था. +2 मे तो 89.4% लिए पर असली इंतजार दूसरे रिजल्ट का था और वो
 
हिन्दी साहित्य मंच
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कितने सुंदर हैं गुब्बारे

सरस पायस पर प्रकाशित मेरी बाल कविता कितने सुंदर हैं गुब्बारे का लुत्फ़ आप भी उठाइए। रावेन्द्रकुमार रवि जी ने इसमें कुछेक परिवर्तन कर इसे और भी रोचक बना दिया है... आभार !! लाल-बैंगनी-हरे-गुलाबी,रंग-बिरंगे हैं ये प्यारे।एक नहीं हैं इतने सारे,कितने सुंदर हैं
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अम्मा ज़रा देख तो ऊपर,

इस बार कुछ कवितायें प्रतिमा की यादों से. प्रतिमा युवा प्रतिभा की प्रतिमा हैं. बनारस में रहती हैं और बहुत सी गतिविधियों से जुडी हुई हैं. दाना-पानी की तसल्ली के अलावा मानसिक खुराक की जबर्दस्त तैयारी करके रखती हैं. मेरे आग्रह पर उन्होंने यह कविता भेजी है.
 
Vibha Rani
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रैना दी ने ठोंक सुलाया ।

बारिश अम्मा ने नहलायादिन हुआ दिगम्बर धुला धुला जागे लोगों के कपड़े पहने साथी सूरज संग स्कूल चला। हँसी ठिठोली बाँह मरोड़ी आसमान सूरज चढ़ धायाकुट्टी कर ली दिन गुस्साया छाँह किताबें पटक चला। सूरज जो झाँके दिन भी ताके हवा लाल के बँटे बतासे भर भर पेट दिन ने
 
गिरिजेश राव
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कागज़ की नाव...(बाल कविता )...कुमार विश्वबंधु

आओ बनायें कागज़ की नाव !आओ चलायें कागज़ की नाव !" लो खा लो खाना '' कहते हैं नाना - फिर तुम चलाना कागज़ की नाव Iआओ बनायें कागज़ की नाव !आओ चलायें कागज़ की नाव !'' आँगन में पानी '' कहती है नानी -जाना है हमको सपनों के गाँव I
 
हिन्दी साहित्य मंच
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पुस्तकों के प्रति आकर्षण जरुरी (विश्व पुस्तक दिवस पर)

पढना किसे अच्छा नहीं लगता। बचपन में स्कूल से आरंभ हुई पढाई जीवन के अंत तक चलती है. पर दुर्भाग्यवश आजकल पढ़ने की प्रवृत्ति लोगों में कम होती जा रही है. पुस्तकों से लोग दूर भाग रहे हैं. हर कुछ नेट पर ही खंगालना चाहते हैं. शोध बताते हैं कि इसके चलते लोगों की
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धरती से मरूभूमि भगाएं (पृथ्वी दिवस पर प्रस्तुति)

सुन्दर-सुन्दर वृक्ष घनेरेसबको सदा बुलातेले लो फल-फूल सुहानेसब कुछ सदा लुटाते। करते हैं जीवन का पोषणनहीं करो तुम इनका शोषणधरती पर होगी हरियालीतो सारे जग की खुशहाली।वृक्ष कहीं न कटने पाएंसंकल्पों के हाथ उठाएंढेर सारे पौधे लगाकरधरती से मरूभूमि भगाएं।
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सूरज

 रोज सवेरे सूरज आकर ,जग में उजियाला करता  |चाहे कोई धर्म , मजहब हो ,उनमे भेद नहीं करता  |जीवन पथ पर बढते जाओ ,हमको राह दिखाता है  |कर्तव्य मार्ग से डिगो नहीं ,हमको यही सिखाता है  |
 
ADESH KUMAR PANKAJ
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भारत देश

राम -कृष्ण की जन्म भूमि है ,प्यारा अपना देश   |जगद गुरु यह कहलाता है ,प्यारा भारत देश  |भिन्न - भिन्न हैं वर्ण यहाँ ,भिन्न -भिन्न हैं बोली  |भिन्न -भिन्न त्यौहार यहाँ पर ,सब मिलकर खेलें होली  |यहाँ हिन्दू औ मुसळमाँ  सब ,जाते
 
ADESH KUMAR PANKAJ
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तारे

यह आसमान के नन्हें तारे ,चमक  रहे सब मिलकर सारे  |चन्दा से हैं हाथ मिलाते ,आसमान में दौड़ लगाते  |अम्बर से गहरा रिश्ता है ,यह फूलों का गुलदस्ता है  |कोई न इनको गिन सकता है ,कोई न इनको छू सकता है  |
 
ADESH KUMAR PANKAJ
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‘‘मोबाइल फोन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

पापा ने दिलवाया मुझको,सेल-फोन इक प्यारा सा।मन-भावन रंगों वाला,यह एक खिलौना न्यारा सा।।रोज सुबह को मुझे जगाता,मोबाइल कहलाता है।दूर-दूर तक बात कराता,सही समय बतलाता है।।नम्बर डायल करो किसी का,पता-ठिकाना बतलाओ।मुट्ठी में इसको पकड़ो और,संग कहीं भी ले
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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‘‘चिड़िया रानी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बच्चों अर्थात् नन्हीं कलियों और सुमनों को समर्पित हैः यह “नाइस” ब्लॉग! चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर, मीठा राग सुनाती हो।आनन-फानन में उड़ करके, आसमान तक जाती हो।।मेरे अगर पंख होते तो, मैं भी नभ तक हो आता।पेड़ो के ऊपर जा करके, ताजे-मीठे फल खाता।।जब मन करता मैं
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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टेसूरा, टेसूरा

यह कविता भी शिवम की ज़बान से. शिवम 2री कक्षा का छात्र है, बेहद शरारती, बेहद चंचल और बेहद बातूनी. आप उससे बात करते रह जायें, आप शायद थक जाएं, वह नही हार माननेवाला. सुनिए उसकी ज़बान से यह कविता. आप पढें मगर समझें कि सुन रहे हैं. अब आप भी अपनी याद को जरा
 
Vibha Rani
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सूरज जल्दी आना जी,

इस बार की कविता शिवम की ज़बान से. शिवम 2री कक्षा का छात्र है, बेहद शरारती, बेहद चंचल और बेहद बातूनी. आप उससे बात करते रह जायें, आप शायद थक जाएं, वह नही हार माननेवाला. सुनिए उसकी ज़बान से यह कविता. आप पढें मगर समझें कि सुन रहे हैं. अब आप भी अपनी याद को
 
Vibha Rani
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टमाटर

लाल टमाटर प्यारा है ,हर सब्जी से न्यारा है  |जो भी इसको खाता है ,चुस्ती - फुर्ती पाता है  |कभी नहीं  हो  वह  बीमार ,सारे जग का पाये प्यार  |
 
ADESH KUMAR PANKAJ
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‘‘कौआ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कौआ बहुत सयाना होता।कर्कश इसका गाना होता।।पेड़ों की डाली पर रहता।सर्दी, गर्मी, वर्षा सहता।।कीड़े और मकोड़े खाता।सूखी रोटी भी खा जाता।।सड़े मांस पर यह ललचाता।काँव-काँव स्वर में चिल्लाता।।साफ सफाई करता बेहतर।काला-कौआ होता मेहतर।।(चित्र गूगल सर्च से साभार)
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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झूमता हुआ नया साल फ़िर आया....

नया सालएक नई आशानई उम्मीद जगाता हुआकलेंडर के पन्नों परउतर आता हैऔर कुछ दिन तोअपने नयेपन के एहसास सेकुछ तो अलग रंग दिखाता है....फिर ढलने लगते हैं लम्हेवक़्त यूँ ही गुजरता जाता है ....कुछ नया होने की आस मेंयह जीवन यूँ ही बीतता जाता हैनए साल की सबको बहुत
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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चंदा मामा दूर के,

यह कविता भी हमें रेखा दी के सौजन्य से मिली है। हालांकि यह बहुत पुरानी कविता है और लगभग सभी को पाता है, फ़िर भी इसे यहाँ देने का अपना लुत्फ़ है। चंदा मामा दूर के, पुए पकाए गुड के , आप खाए थाली में, मुन्ने को दें प्याली में, प्याली गयी टूट, मुन्ना गया र
 
Vibha Rani
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एक अजूबा हमने देखा

एक अजूबा हमने देखा कुएं में लग गई आग पानी पानी जर गओ, मछरी खेलें फाग नाव में नदिया डूबी जाए एक अजूबा हमने देखा कुँए में लग गई आग पानी पानी जर गओ, मछरी खेलें फाग नांव में नदिया डूबी जाये -स्वप्निल
 
Vibha Rani
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बहुत दिनों तक चूल्हा रोया

इस बार एक कविता बाबा नागार्जुन की। इसे मैंने अपनी बड़ी बिटिया तोषी को सिखाया था, जब वह ६ या ७ साल की थी। उसने अपने स्कूल में इसे सुनाया था। इस कविता की खासियत यह है की यह हर उम्र, हर वक़्त, हर काल के लिए माजून हाय। इस कविता की एक और खासियत है की इसमे क
 
Vibha Rani
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"सब बच्चों का प्यारा मामा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

चन्दा-मामा !! नभ में कैसा दमक रहा है। चन्दा मामा चमक रहा है।। कभी बड़ा मोटा हो जाता। और कभी छोटा हो जाता।। करवा-चौथ पर्व जब आता। चन्दा का महत्व बढ़ जाता।। महिलाएँ छत पर जाकर के। इसको तकती हैं जी-भर के।। यह सुहाग का शुभ दाता है। इसीलिए पूजा जाता है।।
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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आज है धनतेरस

पापा आज है धनतेरस ऐसे बैठे हो क्यों नीरस पता नहीं है क्या तुमको बाजार जाना है हमको दादी ने है मुझे बताया क्यों धनतेरस मनाते हैं आज के दिन बाजार से हम नई-नई चीजें लाते हैं कोइ लाता सोना-चाँदी कोइ रसोई के बर्तन फ्रिज-टीवी भी लाते हैं और लाते रोली-चंदन
 
Disha
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जलते हैं दिए

दिये जले सबके दिल में जलते हैं दिए राह में, करने को उजियारा प्रकाश की हुयी जय, और पराजित हुआ अँधियारा आगे पढ़िए मेरी कलम से हिदयुग्म पर बाल उद्यान में
 
Disha
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स्कूल खुलने की आयी बारी

बच्चों कर लो अब तैयारी, स्कूल खुलने की आई बारी. जो मिली थी याद करने को, रट ली न कवितायें सारी. किताब-कॉपियां , चैक करो, बस्ते में डालो बारी-बारी, पेन्सिल बॉक्स में, रबड़ -कटर है , अरे, पर पेन्सिल कहाँ गई तुम्हारी, खूब मेहनत से फिर पढना लिखना, बातें स
 
अजय कुमार झा
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नेता जी सुभाष चन्द्र बोस

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस नेता जी सुभाष चन्द्र बोस जी के जन्म-दिवस पर एक कविता सुभाष चन्द्र जी बोस महान थे बच्चो वो गुणों की खान तीक्ष्ण बुद्धि उन्होंने पाई देते थे अंग्रेज दुहाई बचपन से ही थे महान सभ्य,सुसंस्कृत और विद्वान अपने देश से करते प्यार प्रभ
 
सीमा सचदेव