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उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (3.)

मेरी अम्मा अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी. सिर्फ़ पाँचवाँ पास थीं. पहले लोग अपनी लड़कियों को अक्षरज्ञान करा देते थे, जिससे कि वे चिट्ठी लिख सकें. अम्मा को भी चिट्ठी लिखने भर की शिक्षा मिली थी. पिताजी जब उन्हें साथ लेकर आये तो पढ़ाना शुरू कर दिया. अम्मा का जी
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उनकी ज़िंदगी के वो रूमानियत भरे दिन (2.)

हिन्दी सिनेमा का स्वर्णकाल (पचास और साठ के दशक) पिताजी के जीवन का भी स्वर्णकाल था क्योंकि वे उस समय युवा थे और नयी-नयी शादी हुयी थी. अपने खानदान क्या, पूरे गाँव में अपनी पत्नी को अपने साथ शहर लाने वाले पिताजी पहले युवक थे. नहीं तो उस समय पिया लोग कमाने
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उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (1.)

पिताजी ने पढ़ाई पूरी करते ही घर छोड़ दिया था. वे वहाँ से बाहर निकलकर कुछ करना चाहते थे और अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से जीना चाहते थे. गाँव की कुरीतियों और अन्धविश्वासों से उनका मन भी ऊबा था. फिर तब खेती में बहुत श्रम करने पर भी कम आय होती थी और सिर्फ़ लोगों
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पिताजी का बचपन (2)

पिताजी के बचपन में देश में विद्यालयों की संख्या बहुत कम थी. उन्हें खुद लगभग दस किलोमीटर दूर पढ़ने जाना पड़ता था. रास्ते में एक नदी और उसके किनारे श्मशान पड़ता था. वापस लौटते-लौटते अंधेरा हो जाता था. पिताजी के साथ के लड़के सारे रास्ते हनुमान चालीसा पढ़ते
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पिताजी का बचपन (1)

मेरे पिताजी के बारे में लोग कहते थे कि वे अपने समय से पचास साल आगे की सोच रखने वाले इन्सान थे. बहुत ही खुले विचारों के, तार्किक, बुद्धिवादी, बेहद लोकतान्त्रिक, मस्तमौला और फक्कड़ किस्म के आदमी थे. वे नास्तिक थे. मतलब, ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे. ये