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बारिश आने ही वाली है

बारिश आने ही वाली है . तपी हुई थी धरती ऐसे तवा आग पर रक्खा जैसे तभी हवा का झोंका आया चला किधर से? आया कैसे? वह देखो तो आसमान पर घिर आयी बदली काली है . गर्मी का इलाज करने को मन की बेचैनी हरने को बादल के रथ पर आयी है खेतों में पानी भरने को . पेड़ झूमते हाथ
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सुनो… मुझे तुम्हारी ये बातें अच्छी लगती हैं.

वो शायद जुलाई की शाम थी या अगस्त की…याद नहीं. हम यूँ ही बातें करने की जगह ढूँढते-ढूँढते सरस्वती घाट पहुँच गए थे. वो जगह खूबसूरत है और हमारी मजबूरी भी क्योंकि इलाहाबाद में घूमने-फिरने के लिए इनी-गिनी जगहों में से एक है. उन दिनों मैं जबरदस्त इमोशनल
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हिन्दी नवगीतों में बादल

ये सूखे बादललगते बेहाल से।मानसून कब लौटेगाबंगाल से? (जयकृष्ण राय तुषार)आदिम युग से विश्व साहित्य तथा साहित्य की विविध विधाओं में बादलों का विभिन्न रूपों में वर्णन मिलता है। संस्कृत के महान कवि कालिदास का 'मेघदूतम्‌' एक सर्वोत्तम काव्य कृति है। अलाव की
 
जयकृष्ण राय तुषार
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तू जी ऐ दिल जमाने के लिए/मन्ना डे/बादल/

खुदगर्ज़ दुनिया में ये,इंसान की पहचान हैजो पराई आग में जल जले,वो इंसान हैअपने लिए जीए तो क्या जीए - २तू जी ऐ दिल जमाने के लिएअपने लिएबाज़ार से जमाने के,कुछ भी न हम खरींदेगे-२हाँ, बेचकर खुशी अपनी औरों के गम खरीदेंगेबुझते दिए जलाने के लिए-२यू जी ऐए दिल,ज़माने
 
Aflatoon
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दिलों की मजिल

मंजिल है...दिल तक पहुँचने की इस राह मे, ना जाने कितनी हसरतें जागती है| बिन पूछे मुझसे मुझी को सताती हैं| न कभी देखा, ना कभी जाना जिसे, ना ही महसूस किया कभी, कहाँ से आकर जाने ? दिल मे मेरे, सुबह शाम मुझे जगाती है| इस राह मे, सुंदर सपनों की दुनिया है|
 
मेनका
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अगर ऐसा भी होता.....तो....कैसा होता.....

अगर ऐसा भी होता तो ... कैसा होता ... बादल की डालियों पर हवा के पालने पर ... झूल पाते हम ... तो कैसा होता .... सूरज की किरणों को थाम पहुँच पाते आकाश तक छू लेते बस जरा सा ... तो कैसा होता .... अगर ऐसा भी होता तो ... कैसा होता .... इन्द्रधनुष के सातों र
 
मेनका
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एक नारी की कविता

मेरी कविता सायास नहीं बनायी जाती भर जाता है जब मन का प्याला लबालब भावों और विचारों से तो निकल पड़ती है अनायास यूँ ही पानी के कुदरती सोते की तरह और मैं रहने देती हूँ उसे वैसे ही बिना काटे बिना छाँटे मेरी कविता अनगढ़ है गाँव की पगडंडी के किनारे पड़े अन
 
mukti
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चुप हो जाओ

कि एक हवा चली है चुप हो जाओ बह जाओ  । कि एक फूल खिला है चुप हो जाओ खिल जाओ । कि एक दीप जला है चुप हो जाओ जल जाओ । कि एक बादल निकला है चुप हो जाओ बरस जाओ । कि एक पत्ता टूटा है चुप हो जाओ खो जाओ । कि एक सूरज निकला है चुप हो जाओ भर जाओ । कि एक प्रे
 
चंदन कुमार झा
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मुद्दत तलक वो मुझे फूंकती थी !

किसी ने उसे जलाया कभी था मुद्दत तलक वो मुझे फूंकती थी बादल को मैंने कहा था कभी कि बूँदें तुझे एक दिन छोड़ देंगी मुहब्बत की ताजी नजर से गिरी हो कायनात को तुम डुबो के रहोगी कड़ी धूप में जिंदगी तप रही है मैंने तेरे सारे छाँव खो दिए हैं छोड़ दिया उसने जब ख्
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बादल के टुकड़े

मुट्ठी मेंआकाश पकड़ना चाहा थाकुछ बादल के टुकड़ेमेरे हाथ लगेहम अम्बर को देखतरसते रहते हैंये बादल दिन-रातबरसते रहते हैं
 
mukti
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अधबनी बिल्डिंग फ़ायदेमंद भी हो सकती है !

मैं यहीं रहता हूं...नहीं-नहीं...मेरा मतलब यहां से कुछ फ़्लोर नीचे। हमारे जो बिल्डर महाशय हैं वो रिसेशन के नाम पर बिल्डिंग पूरी करने का नाम नहीं ले रहे। दूसरे फ़्लोर, जहां हम रहते हैं, वहां की खिड़की से झांक कर देखा तो बादल अपनी पूरी रंगत लिये मुस्कुरा
 
प्रबुद्ध
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उसकी आंख में बादल था

जिनकी आंख में बादल था... उसने पांचवीं बार यही लाइन कही लेकिन पूरा होने से पहले ही इस बार भी लड़की ने उसे टोक दिया। बोली-ये सब बाद में सुनाना बारह बजने से पहले अपने मोबाइल से दो एसएमस कर दो ताज के लिए... नहीं, मैं नहीं करूंगा। क्‍यों नहीं करोगे, तुम प
 
शायदा
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अल्फ़ाजों की लहरें-हिंदी शायरी

दिल में जलती गम की आग गर्मी में दोपहर की तपिश उसे और बढ़ा देती है। वर्षा की बूंदों के इंतजार में में पथरा गयी हैं आंखें जल रहा है बदन कोई सागर ढूंढता हूं जिसकी ठंडक तसल्ली दे सके पर नउम्मीदी नरक सजा देती है। उठा रहा हूं इसलिये अल्फाजों की लहरें शायद ब
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