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हर घर में है एक खाप पंचायत

हर घर में एक खाप पंचायत हैखाप पंचायतें इन दिनों हर जगह चर्चा का विषय हैं। इनके द्वारा निर्णय और उन निर्णयों पर क्रूरतापूर्ण अमल न्यायपालिका से कहीं अधिक तेज़ गति से होता है। वैसे तो ये पंचायतें वर्षों पुरानी है और इस तरह के दिल दहलाने वाले निर्णय पहले भी
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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प्यार और तक़रार

रब्बाई इयाकोव की पत्नी उससे बहस करने के लिए सदा मौके की फ़िराक़ में रहती थी. लेकिन इयाकोव उसके उकसाव पर कभी ध्यान नहीं देता था और हमेशा शांत रहता. फिर एक रात भोजन के समय ऐसा हुआ कि मेहमानों के सामने अपनी पत्नी से गरमागरम तक़रार करके इयाकोव ने सभी को हैरत
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पुरस्कार तो पप्पू को ही मिलेगा

ऐसे दौर में जबकि पुरस्कारों की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठ रहे हों तब कथादेश की कहानी प्रतियोगिता में ढाई सौ कहानीकारों का शामिल होना चौंकाता है। बहुतेरे लेखकों को यह भलिभांति मामलू होता है कि प्रतियोगिता में उसकी रचना को पहले ही छांट दिया जाएगा। यही नहीं
 
ओमप्रकाश तिवारी
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हिंदी में इतने कहानी लेखक और पाठक नहीं

कथा देश का मार्च अंक खास रहा। इसमें पत्रिका ने उन कहानियों को प्रकाशित किया है जिन्हें उसने एक अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता के माध्यम से पुरस्कार देने के लिए चुना है। संपादक का दावा है कि इस प्रतियोगिता के लिए उसे दो सौ से अधिक कहानियां मिली थीं। जिसे
 
ओमप्रकाश तिवारी
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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना अज्ञेय को 'सी आई ए का एजेंट कहते थे

( यह जनमत में प्रकाशित अजय सिंह के आलेख आलेख का दूसरा हिस्सा है। पाठकों ने इसके साथ इसी अंक में प्रकाशित प्रणय कृष्ण के जवाब को भी देने की मांग की थी तो उसका स्कैन भी शीघ्र लगाया जायेगा। पहला हिस्सा यहां और कांग्रेस फ़ार कलचरल फ़्रीडम, जिससे अज्ञेय का
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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अज्ञेय और सी आई ए

( अज्ञेय पर अजय सिंह का यह आलेख समकालीन जनमत के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुआ है। उनकी सम्राज्यवाद सेवी भूमिका को भुलाकर उन्हें फिर से धो-पोंछ कर स्थापित होने की जो कोशिशें हो रही हैं उनमें पारंपरिक वाम विरोधियों के अलावा ख़ुद को वामपंथी कहने वाले भी शामिल
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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एक बेकार की बहस्

एक बेकार की बहसउद्यमेन हि सिद्धंते, न हि कार्याणि मनोरथैः [स्पेलिंग मिस्टेक हो तो संस्कृत के विद्वान क्षमा करें]वीरेन्द्र जैन्प्रत्येक मित्र मण्डली में कुछ मित्र ऐसे होते हैं जिन्हें विवादी या बहसी कह कर पुकारा जाता है। सच तो यह है कि ये लोग ही वैचारिक
 
वीरेन्द्र जैन
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जवाब दें संघी ब्लाग भोंपू

(दंतेवाड़ा घटना के तुरत बाद संघ के गोएबल्स ने यह प्रचार किया कि जे एन यू के छात्रों ने इस 'खुशी' में पटाखे छोड़े और ख़ुशियां मनाईं। गांधी की मौत पर जलसे मनाने वालों को वैसे भी दुष्प्रचार की आदत और लंबी प्रैक्टिस है, लेकिन इस बार मीडिया ने भी कन्फ़र्म
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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सरदार पटेल का सच!!

(अक्सर संघ परिवार सरदार पटेल को हिन्दुत्व के नायक के रूप में प्रस्तुत करता रहा है और मोदी, आडवाणी को छोटा-मोटा सरदार पटेल साबित करने की कोशिश करता रहा है। सरदार पटेल न तो प्रगतिशील थे न ही नेहरु की तरह धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक। फिर भी आज़ादी की लड़ाई में
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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कम्युनिज्म एक बेकार के यूटोपिया के अलावा और कुछ नहीं ?

मई दिवस का संक्षिप्त इतिहासःहे मार्केट के शहीदों का खून बेकार नहीं जायेगा -- अरुण माहेश्वरीपेरिस कम्यून कार्ल माक्र्स और फ्रेडरिख एंगेल्स ने ‘कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणा-पत्र’ का प्रारंभ इन पंक्तियों से किया था - ”समूचे यूरोप को एक भूत सता रहा है -
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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शौहरत और दौलत

शौहरत और दौलतअक्सर सोचता हूं ..जिन्दगी जो हम जी रहे हैं किस लिए...उसमें क्या क्या महत्वपूर्ण हैं.. जिससे पूछा ,सब ने कहा एक खुशहाल जीवन के लिए जिन्दगी में खुशियां होनी ज़रूरी हैं ,,और खुशियों को कैसे परिभाषित किया जाए..तो कहा सब ठीक ठाक हो...सब स्वस्थ
 
shan
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कामगारों का सवाल

मई दिवस का गौरवशाली इतिहास और आज की चुनौतियाँ - सत्यम सत्येन्द्र पाण्डेय औद्योगिक पूंजीवादी क्रांति ने सामंतवादी उत्पादन संबंधों को समाप्त किया. फलस्वरूप बड़ी संख्या में दस्तकार और भू-दास बेरोजगार होकर और अपना सब कुछ खोकर फैक्ट्री व्यवस्था को मजदूर बनने
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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भोजपुरी भाषा..... बाजार की भाषा में रचा गया ‘लंपट साहित्य’

     (अभी रंगनाथ सिंह के ब्लाग पर भोजपुरी के सम्बंध में एक आलेख पढ़कर  मुझे                                            
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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फिर पूंजीवाद किस बात का जश्न मना रहा है?

(युवा संवाद के प्रदेश संयोजक प्रदीप की मई दिवस पर लेखमाला का दूसरा अंश)19 वी शताब्दी में पूंजीपति वर्ग के खिलाफ संघर्ष में तेजी आयी। 1831 में फ्रांस के लियों  नगर में मजदूरों का विद्रोह हुआ, जिसे सरकारी सैनिकों ने निर्ममता से कुचल डाला। ब्रिटेन जोकि
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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मई दिवस पर कुछ मुख़्तसर सी बातें

(युवा संवाद के प्रदेश संयोजक प्रदीप की मई दिवस पर लेखमाला का पहला अंश)‘मनुष्य जितना अधिक मूल्य पैदा करता है वह उतना ही कम उपभोग करता है, वह जितना ही मूल्य पैदा करता है उतना ही मूल्यहीन होता जाता है’........‘बुर्जूआ समाज में जीवित श्रम संग्रहीत श्रम को
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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नक्सलवादः किसे मारा जाना चाहिये ( पहली किस्त)

मेरे दिमाग में नक्सलवाद गूंज रहा है। दांतेवाड़ा के बाद कुछ ज्यादा ही। ब्लाग में इधर-उधर नज़र दौड़ाओ तो कदम - चार कदम पर एक लेख नक्सलवाद पर उपलब्ध है। मुझे नक्सलवाद, माओवाद की इतनी ही जानकारी है कि लोग मर रहे हैं मार रहे हैं, मैं व्यथित हूँ इस मार-काट से।
 
प्रीतीश बारहठ
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क्या अम्बेडकर दलितों के मसीहा थे?

डा अम्बेडकर(यह जाने माने विचारक सुभाष गाताडे के लंबे आलेख का एक हिस्सा है जिसे युवा संवाद ने एक पुस्तिका के रूप में छापा है)एक बात जो लगभग हमारे सहजबोध (कामन सेन्स) का हिस्सा बन गयी है - जिसका हम पहले उल्लेख कर चुके हैं - जो डा अम्बेडकर के बारे में कही
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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दंतेवाड़ा -- कौन किसको मार रहा है?

आज मन बहुत दुखी है। दंतेवाड़ा में 75 जवान नक्सल हमले के शिकार हो मारे गए। वे किसी न किसी माता-पिता के पुत्र, किसी पत्नी के पति और बच्चों के माता-पिता होंगे। क्या हुआ होगा जब यह खबर उन आश्रितों पर पहुँचेगी जिन का आश्रयदाता इस हमले में मारा गया। वे सभी
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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नागरिक और मनोज जी को जवाब

भारतीय नागरिक और मनोजजी की टिप्पणी से ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों हमारे विचारों से सहमत नहीं हैं। जो हम समझ पा रहे हैं वो ये कि हमने कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप समाज की जरूरत है। हम नागरिक और मनोजजी के विचारों और भावनाओं की कद्र करते हैं,  लेकिन यहां
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परिभाषा में बंधते ही प्रगतिशीलता रुढ़ि बन जाती है.

@@@@@@@@@@@@फ़ेस बुक पर एक दोस्ताना बहसArkjesh Kumar कोई भी विचार जब समय और परिस्थति के अनुसार स्वयं को अपडेट नहीं करता तो वह रुढि बन जाता है । रुढि बदलाव की और रूढ़िवादी, बदलाव करने वालों के दुश्मन बन जाते हैं । हर "वाद" प्रगतिशीलता का दुश्मन होता है ।
 
sanjaygrover
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परिभाषा में बंधते ही प्रगतिशीलता रुढ़ि बन जाती है.

फ़ेस बुक पर एक दोस्ताना बहसSanjay Grover : परिभाषा में बंधते ही प्रगतिशीलता रुढ़ि बन जाती है।Sat at 12:10pm Friends of Friends • Comment •LikeUnlikeBabykumari Kumari, Vijay Krishna Mishra, Ajay Kumar and 2 others like this.Arkjesh Kumar कोई उदाहरण ? Sat at
 
sanjaygrover
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टिप्पणी दें कि यदि समाज के लिए आवश्यक है ये सब, तो घर से ही शुरुआत करें

विशेष - इन विषयों पर चर्चा जरूरी समझ में आई, इस कारण आज टिप्पणी कि सुविधा शुरू की जा रही है। कृपया टिप्पणी करने के लिए नहीं, कोई विचारात्मक चर्चा के लिए यहाँ आयें। विस्तार से कहना चाहें तो कृपया हमें मेल भी करियेगा। निवेदन है, ये। e-mail -
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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ये क़ाजी इतना क्यूं उछलता है भाई?

बड़ी पुरानी कहावत है कि ' मिया बीबी राज़ी तो क्या करेगा क़ाज़ी'आज सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा उसमें यही अन्तर्निहित था। सीधी सी बात है कि जिस समाज में बालिग होने के बाद आपको अपनी सरकार चुनने का हक़ मिल जाता है वहां इसी उम्र में आपको अपने साथी और उसके साथ
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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जागो और बहस में हिस्सा लो

एक वरिष्ठ और राष्ट्रीय स्तर के नेता ने मौजूदा स्वरूप में महिला आरक्षण विधेयक के प्रति अपना विरोध दोहराते हुए लखनऊ में एक कार्यक्रम में कहा था कि यदि विधेयक इस रूप में पारित हो जाता है तो इससे आम महिलाएं नहीं बल्कि उद्योगपतियों और अधिकारियों के घरों में
 
PRATIBHA RAI
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भारत में धर्मनिरपेक्षता और उसकी लाक्षणिकता

मेरा विषय धर्मनिरपेक्षता का विवेचन या उसके संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करना नहीं है। मेरा विषय तो भारत में धर्मनिरपेक्षता के बिगडैल स्वभाव, उसके संकुचित दृष्णिकोण और धर्मनिरपेक्षता की गलत व्याख्याओं से परिचय कराना ही है। इसी प्रयास में थोड़ा संविधान
 
प्रीतीश बारहठ
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क्यूँ नहीं किया जा सकता कोटे में कोटा ! ःः महिला आरक्षण

महिला आरक्षण बिल के दो महत्त्वपूर्ण प्रावधान हैं एक तो यह कि महिलाओं को राज्य और केन्द्र विधान मण्डलों 33 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त होगा। दूसरा यह कि महिलाओं हेतु ये 33 प्रतिशत निर्वाचक मण्डल बारी-बारी से पृथक-पृथक होंगे। अर्थात वर्तमान के प्रावधान के
 
प्रीतीश बारहठ
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हूसैन मेरी आँख में !

मैं एक आस्तिक हूँ। परंपरा और संस्कार से हिन्दु पद्धतियाँ ही मुझे मिली हैं। मैं किसी भी कला के बहाने से सरस्वती का नग्न चित्रण स्वीकार नहीं कर सकता। जाहिर है, हूसैन से मुझे भी शिकायत ही है। लेकिन मैं विरोध में अपने स्थान से खड़ा होना तो दूर गहरा सांस भी
 
प्रीतीश बारहठ
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गलत नहीं हैं लालू-मुलायम

इन दिनों महिला आरक्षण बिल का विरोध कर रहे लालूप्रसाद यादव और मुलायमसिंह यादव की छवि विलेन की सी बनाई जा रही है। कहा तो यह भी जाता है कि महिला आरक्षण बिल के साथ समर्थन और विरोध करने वाले सभी पुरुष राजनीतिज्ञों की आपसी सहमति के तहत यह नाटक किया जाता है,
 
प्रीतीश बारहठ
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क्यों नहीं लिखतीं महिलाएं व्यंग्य?

पिछले कई दिनों से ये प्रश्न मेरे दिमाग में उथल-पुथल मचा रहे हैं कि महिलाएं व्यंग्य क्यों नहीं लिखतीं? व्यंग्य लेखन में पुरुषों का ही दबदबा क्यों बना रहता है? लेखन के जिन खांचों के भीतर रहकर महिलाएं लिखती हैं, उनमें स्त्री-विमर्श तो हर कहीं मौजूद है,
 
अंशुमाली रस्तोगी
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पति पत्नी के बीच

.पत्नी सही या पतिकाल कोई भी हो पर पति पत्नी के संबधों में मधुरता कम और तनाव ज्यादा रहता है। कल मैं एक क्लब मैं अपने पुराने मित्र के साथ बैठा गुज़रे वक्त का ज़िक्र कर रहा था । तभी उसने मुझ से मेरे विवाहित जीवन के बारे में पुछा ..मैंने चुप रहे कर गर्दन
 
shan
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कौन हैं वास्‍तव में दलित पत्रकार .....

अचानक संवेदनशीलता का ज्‍वार उमड़ पड़ा, मीडिया में दलितों की खोज हो रही है. इस बात पर बहस छेड़ने की कोशिश हो रही है कि मीडिया में दलित उपेक्षित क्‍यों हैं..... अचानक इसकी जरूरत क्‍यों आ पड़ी? किस छिपे हुए एजेंडे को लेकर यह षड्यंत्रपूर्ण बहस छेड़ी गई ह
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आगे बढ़ती भूख की कहानी

निष्ठा चुघ लंदन से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए दुनियाभर में बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषण के शिकार हैं बहुत सालों पहले एक तस्वीर देखी थी. एक गिद्ध और एक बच्चा. लुपलुपाती आँखों वाला एक निर्मम माँसखोर पक्षी और उससे थोड़ी ही दूर ज़मीन पर हड्डियों के ढांच
 
ओमप्रकाश तिवारी
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पूँजीवाद के भविष्य पर सवालिया निशान

मुकेश शर्मा बीबीसी संवाददाता इस आर्थिक संकट में सरकारी हस्तक्षेप ने पूँजीवाद के भविष्य पर सवालिया निशान लगाए हैं दुनिया भर में गहराते आर्थिक संकट के संदर्भ में इन दिनों पश्चिमी देशों में चर्चा गर्म है पूँजीवाद को लेकर. अमरीकी सरकार और यूरोप में सरकार
 
ओमप्रकाश तिवारी
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रोमन हिंदी भी हिंदी है

जब हम हिंदी भाषा के विनाश पर दुखी हो रहे होते हैं या उसका स्वर्ण युग दर्ज कर खुशी जता रहे होते हैं तो अनजाने में हमसे एक छोटी सी गलती हो रही होती है। अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश या अरबी, फारसी, चीनी, जापानी की तरह हिंदी कोई यकसार भाषा नहीं है। ह
 
चंद्रभूषण
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दो व्यस्क स्त्री और पुरूष किन-किन शर्तों पर शारीरिक संबंध बना सकते हैं ?

दो व्यस्क स्त्री और पुरूष किन-किन शर्तों पर शारीरिक संबंध बना सकते हैं ? निश्चय ही यह प्रश्न कानून की सीमारेखा से बाहर है। उनके बीच का जोड़ धन से बना है या यश से या ख्याति से या विवाह से या प्यार से इससे किसी तीसरे व्यक्ति या कानून का कोई वास्ता
 
रंगनाथ सिंह
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ग्राहकों को सजा हो

कैथरीन मैकिनन, कानून विशेषज्ञ और नारीवादी विचारक जब तक देह का भोग करने वालों पर शिकंजा नहीं कसा जाएगा,यह अमानवीय व्यापार जारी रहेगा। मौजूदा कानूनी ढांचा तो मजबूर औरतों पर ही अपना शिकंजा कसता है। जबकि असली दोषी तो इस व्यापार की मांग करने वाला है। अगर
 
रंगनाथ सिंह
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यह व्यापार मंजूर नहीं

मृदुला सिन्हा हाल ही में उच्चतम न्यायालय के पीठासीन न्यायधीशों दलबीर भंडारी और ए.के पटनायक की पीठ ने महान्यायवादी से कहा यदि देह व्यापार को कानूनी ढंग से रोका नही जा सकता तो इसे वैध क्यों नहीं कर दिया जाता। अनुमान है कि न्यायधिशों ने गुस्से में यह बा
 
रंगनाथ सिंह
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आधी दुनिया का एक अंधेरा कोना

गीताश्री सुप्रीम कोर्ट ने भले ही तल्ख होकर केंद्र सरकार को कहा कि वह अगर दुनिया के सबसे प्राचीनतम धंधा यानी वेश्यवृति को नहीं रोक सकती तो क्यों नहीं उसे कानूनी मान्यता दे देती है। वैध हो जाने के बाद कमसेकम उनकी हालत तो सुधर जाएगी। अभी तो सरकार ना ही
 
रंगनाथ सिंह
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खून से लिखा हुआ भी बे-असर होता है अब

आजकल सलीम खान नामक सज्जन से ढेरों लोग नाराज़ हैं!! भाई अविनाश ने तो महल्ला से ही उन्हें खारिज कर दिया! लेकिन उनका दर्द क्या है। एक शे'र ज़ेहन में उतर ता है: तुमको मालूम नहीं है दिल को दुखाने वाले यह जो मज़लूम हैं आहों में असर रखते हैं ! उनकी एक मेल मिल
 
शहरोज़
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सॉलिटरी रेसिसटेंस

अरुण कुमार असफल की यह टिप्पणी विष्णु खरे जी के आलेख पर प्रतिक्रया स्वरूप लिखी गई पोस्ट पर किसी अनाम भीम सिंह जी की टिप्पणी के विरोध में प्राप्त हुई है। अरूण को उसके लिखे से जानने वाले जानते हैं कि अरूण एक गम्भीर रचनाकार हैं और सनसनी की हद तक चर्चाओं
 
vijay gaur/विजय गौड़
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