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जुगलबंदी - दर्पण और अर्श की

कुछ अनूठे और आधुनिक बिम्बों का अपनी कविता, त्रिवेणी, क्षणिका और इन दिनों अपनी कहानी में भी इस्तेमाल कर, दर्पण ने कम समय में ही अपना एक बहुत ही खास स्थान बना लिया है हिंदी ब्लौग-जगत में। वहीं दूसरी तरफ अपने इश्किया शेरों और नाज़ुक ग़ज़लों को लेकर अर्श की
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टौफियाँ, कुल्फियाँ, कौफी के जायके...

कुछ टिप्पणियाँ वाकई संवाद के नये रास्ते खोलती हैं। अभी पिछली पोस्ट पर जो अपनी ग़ज़ल सुनायी थी आपलोगों को मैंने, उस पर वाणी जी की एक टिप्पणी ने मन को छू लिया। उन्होंने लिखा था - "एक काम्प्लेक्स सा आ जाता है ...कहाँ हम वही काल्पनिक प्रेम वीथियों में अटके
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हाकिम का किस्सा...

उधर कई दिनों से >संजीव गौतम जी की ब्लौग पर अनुपस्थिति और फोन पर बात किये हुये एक लंबा अर्सा बीत जाना एकदम से चिंतित कर गया था कि जनाब ठीक तो हैं। फोन लगाया तो उनके कहकहों ने आश्वस्त किया और पता चला कि छुट्टी मनायी जा रही है। बातों ही बातों में वो लगे