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दिल्ली में बसंत चिंतन यानी चिरकुटई

 दिल्ली में बसंत जब आया, तो दिल्ली की पब्लिक कोहरे से जूझ रही थी। बसंत कब आ गया, पता ही नहीं चला। सुना है कि पुराने जमाने में कई कवियों की ड्यूटी इस बात के लिए लगती थी कि जैसे ही बसंत आए, उस पर कविता कर दें। पुराने राजा महाराजा कई कवियों को सिर्फ इस
 
आलोक पुराणिक
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वेलेंटाइन डे और प्रेम

सैसव जीवन दर्शन भेल .....दुहु दल- बलहि दंद परि गेलकबहु बांधाय कच कबहु बिथार ....कबहु झाँपे अंग कबहु उधारथीर नयान अथिर किछु भेल .... उरज उदय - थल लालिमा देलचपल चरन , चित चंचल भान .... जागल मनसिज मुदित नयानविद्यापति कह करू अवधान .... बाला अंग लागल पञ्च
 
sanjay mishra
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बुद्धू सा एक मन, कुछ आहटें और बसंत

कबसे महसूस हो रहा था कि कोई है जो पीछे चल रहा है. कोई आहट सी थी जो लगातार पीछे महसूस हो रही थी. पलटकर देखा तो कोई नहीं...कोई भी नहीं. ध्यान हटाया, कुछ और सोचने का मन बनाया. लेकिन चंद कदम चलते ही फिर आहटें पीछा करने लगी. मुस्कुरा पड़ी मैं. बुढ़ा गई
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शरद में बसंत

इतनी आसानी से जीवन में बसंत आता नहीं पहले पत्ता-पत्ता झरने का सलीका सीख लो... - विवेक भटनागर
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