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पढने का अभाव और लेखन से विरक्ति --- अजीब सी मनोदशा

पूरा दिन गरमी के कारण घर में घुसे रहने के बाद शाम को कुछ बाहर टहलने का मन किया। बाहर निकले भी पर जायें कहाँ यह स्थिति बनी रही, परेशान सा करती रही।कुछ ऐसा ही ब्लॉग लेखन को लेकर हो रहा है। आसपास देखते हैं तो मुद्दों का ढेर दिखता है पर जब लिखने को बैठते हैं
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कुछ खास नहीं पर अच्छे लगे ये चित्र -- यदि देखना चाहें तो...

आपके लिए कुछ चित्र जो हमने अपने मोबाईल से निकाले। इन चित्रों में विशेष क्या है ये तो हम खुद नहीं तय कर पाए पर अच्छे लगे, इस कारण से आप लोगों को भी दिखा रहे हैं.....वैसे ये हर बार नहीं होता कि कुछ लिख कर ही दिखाया जाए.....अपना एक ये भी शौक है जो कभी-कभी
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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बड़ा गुरुर है गूगल को

बड़ा गुरुर है गूगल कोअपनी सोचअपनी तकनीक परनंबर वन सर्च इंजन बना फिरता हैंखोजी दस्तों कामै नज़्म लिखना छोड़ दूंगर तुमको ढूंढ के लाये वो । "प्रिया"
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हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है...

इस समय कुछ हल्का फुल्का सा--गुलाम अली, मेंहदी हसन की गाई हुईं कुछ ग़ज़लों के चन्द शेर हमें बहुत ही पसंद आते हैं, शायद आपको भी आयें?------------------------------------------अंदाज अपने देखते हैं आईने में वो, और ये भी देखते हैं कोई देखता न
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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एक हाइपर्लिंक्ड लम्हा

ज़िन्दगी में कुछ लम्हे हाइपर्लिंक्ड से होते है....बस एक जरा सी क्लिक के साथ एक नया सफ्हा खुल जाता है.................और कभी कभी लिक नहीं भी खुलता, और पेज नाट फाउन्ड का बोर्ड आ जाता है.......बार-बार क्लिक करने पर भी कुछ याद नहीं आता.......पता नहीं क्या
 
सारिका सक्सेना
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नयी तकनीक, मोबाइल और तलवार से तेज सरपत

लुटना तकनीक के नाम पर कहावतें कोई ऐसे ही नहीं बनाई गयी हैं। सच तो यह है कि वे बनाई कहां गयीं हैं वे तो समय की सच्चाई के फ़ोटो-सोटोग्राफ़ टाइप चीजें हैं। हम जुमा-जुमा एक महीने पहले हम बड़े उचके-उचके घूम रहे थे कि हमने लिखा था: उपहार घर वाले देने पर अड़े थ
 
फ़ुरसतिया
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तुम कौन सी शाख के मोर हो जी

कल सुबह दक्षिण भारत की तबाही के सीन टेलिविजन पर देखे। जगह-ए-तबाही से इत्ती दूर फ़िर भी देखकर लगा कि कुदरत भन्नाई हुई है। कोई भन्नाया हुआ आका तबादले में किसी को कहीं किसी को कहीं पटक देता है। तबादलित कर देता है। वैसे ही प्रकृति भी मनमौजी है। पानी मांग
 
फ़ुरसतिया
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पढ़ें फ़ारसी बेचें तेल

पढ़ें फ़ारसी बेंचें तेल एक मुहावरा है। इसके माध्य्म से मुहावरे का रचयिता संभवत: यह कहना चाहना चाहता है कि जब तेल ही बेचना है तो फ़ारसी पढ़ने से क्या फ़ायदा? इसे घुमाकर कहा जा सकता है कि फ़ारसी पढ़कर क्या करोगे ? अंतत: बेचना तो तेल ही है। वैसे तो घुमाने के ब
 
फ़ुरसतिया
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ब्लागर हलकान’विद्रोही’, विक्रम और बेताल

ब्लागर हलकान ’विद्रोही’ ने अपनी डायरी शिवकुमार मिसिर को दे दी थी। थोड़ी देर बाद वापस ले ली। उसके बाद हम उनके भी उनके पास गये तो उन्होंने हमें भी डायरी थोड़ी देर के लिये थमा दी। हमने सोचा कि शायद टिप्पणी करने के लिये दी है। हमने डायरी बिना देखे उनसे कहा
 
फ़ुरसतिया
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मंहगाई के दौर में ,मन कैसे हो नमकीन

कभी कभी हमारा मन करता है कि धांसू-धांसू कुछ शेर लिख डाले जायें। लेकिन हमने जब भी शेर पर हाथ आजमाये , मेमना बनकर रह गये। अपनी समझ में धांसू शेर लिखे तो लोगों ने कहा ये बहर में नहीं है, इसमें कहर है। इसमें वजन नहीं है, इसमें कहन नहीं है। इसका रदीफ़ कहां
 
फ़ुरसतिया
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….गुस्से के पाले में कबड्डी

आज सोचा कि एक पुरानी पोस्ट ही ठेल दी जाये। देखिये। गुस्से के कुछ सौंन्दर्य उपमान [ मिज़ाज, ज़बान और हाथ, किसी पर काबू न था, हमेशा गुस्से से कांपते रहते। इसलिए ईंट,पत्थर, लाठी, गोली, गाली किसी का भी निशाना ठीक नहीं लगता था खोया पानी] मीटिंग अच्छी-खासी च
 
फ़ुरसतिया