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बस की पांच कवितायेँ.
बस अँधेरे की कोई उम्र नहीं होती,बस,उजाले की एक किरण चाहिए।(२)मुझे हाथ बढाने मेंकोई ऐतराज़ नहींबस, एक हाथआगे बढ़ना चाहिए ।(३)मेरा ज़ीने का अंदाज़ निराला है,बस,मैं थोडा बेफिक्र हूँ।(४)वह बड़ी देर तकमेरे सामने खड़ा रहाबस, मैं था किआसमान के खुदा को देखता
Jun 03 2010 10:33 PM



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