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बस की पांच कवितायेँ.

बस अँधेरे की कोई उम्र नहीं होती,बस,उजाले की एक किरण चाहिए।(२)मुझे हाथ बढाने मेंकोई ऐतराज़ नहींबस, एक हाथआगे बढ़ना चाहिए ।(३)मेरा ज़ीने का अंदाज़ निराला है,बस,मैं थोडा बेफिक्र हूँ।(४)वह बड़ी देर तकमेरे सामने खड़ा रहाबस, मैं था किआसमान के खुदा को देखता
 
kandpals
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खाली सीट का चक्कर और मैं

आजकल मेरे दिन और शाम दोनों बड़े अच्छे जा रह है । कारण अज्ञात है । मैं खुद ये जानने की कोशिश कर रहा हू हू आज कल मेरे साथ ऐसा क्या हो रहा है की मेरे साथ कुछ भी नया नहीं हो रहा । अब कल की ही बात है जब ऑफिस से घर जाने लगा तो देखा अभी तो रोशनी ही है मतलब आज
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वीकेंड्स और बस का मज़ा

वीकेंड का विदेशो में बड़ा चलन है मैंने सुना है की विदेशी वीकेंड्स पर शायद ही काम करते है । पर ये इंडिया है मेरे दोस्त यंह वीकेंड्स पर ज्यादा काम होता है । पर शानिवार को मेरे साथ किसी बहारी मुल्क के लोंगो जैसा ही व्यवहार किया गया ।कोई काम नहीं ओन्ली आराम
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घर जल्दी जाने मैं भी लोचा है

कल का दिन सब मायने मैं ठीक था ना ऑफिस मैं ज्यादा काम ना लाइफ मैं कोई नया लोचा । और तो और कल मैं ऑफिस से जल्दी घर जाने का मौका मिला । ऐसा कम ही होता है मेरे साथ तो मैं ऑफिस से निकलते वक्त ही मैंने सोच लिया था की आज घर जा कर क्या क्या करना है मसलन कपडे
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बस की एक अनोखी यात्रा

कल मैं थोडा उदास टाइप था ।  बार बार यही सोच रहा था बस मैं बैठे आधे घंटे हो गए अब तक कुछ नहीं हुआ नया नया ब्लॉग लिखना स्टार्ट किया है । मेरे ब्लॉग करियर को तो ब्लोगारिया रोग लग जायेगा । पर धन्य हो बस देवी और लोंगो का गुस्सा मेनेजमेंट । जरा सा छू दो
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साले, लड़कियों का ठेकेदार बनता है...

ब्लूलाइन बस में स्कूली ड्रेस पहने बैठीं दो लड़कियां। उम्र 13-14 साल रही होगी। उनके ठीक पीछे एक काफी बूढ़ी महिला। बस में 20-22 लोग और भी बैठे थे। सात-आठ मुस्टंडे भी बस में सवार थे। उनमें से दो लड़के , पूरी तरह सहमी हुई लड़कियों के सामने खड़े होकर उनसे
 
शिवेंद्र चौहान
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पप्‍पू बस में होते हुए भी बेबस है (अविनाश वाचस्‍पति)

आपको नहीं मालूम हैपर हम बताते हैंपप्‍पू सरकारी नौकर हैबस चलाता हैफिर भी बेबस है।मुन्‍ना ने जानना चाहापप्‍पू ड्राइवरकितनी देर रहते होबस में ?पप्‍पू ने बतलायाचौबीस घंटे !मुन्‍ना को विश्‍वास नहीं हुआफिर पूछ लिया - कैसे ?आठ घंटे सरकारी बस मेंसोलह घंटे अपनी
 
अविनाश वाचस्पति
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ट्रैफिक की पों...पों...और मेरा मन गीला-गीला।

ऑफिस से घर पहुंचने की जल्दी, घर के रास्ते पर गाड़ियों का शोर और जगह-जगह से उड़ती धूल। रास्ते में बस...किसी कार....या थ्री व्हीलर का बिना बात बजता हॉर्न, बार-बार बजता हॉर्न लगता कि क्या चालक बहरा है या हमें बहरा समझ रखा है या हमें बहरा करने पर तुला हुआ
 
Nitish Raj
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