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इस शहर को फख़्र है बड़प्पन का ~~

कूड़े के ढेर से जीवन चुनता है दिन भर खुद का बोझ ढोता है इस शहर को फख़्र है बड़प्पन का उफ ! यहाँ तो बचपन ऐसे सोता है चित्र : मोबाईल कैमरे से
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यदि बाघ बचाने से फुर्सत मिल गई हो तो अब बचपन बचाने के लिए कुछ करिये

बाल श्रम की एक तस्वीर...............ऐसे बहुत से उदाहरण हमारे आसपास दीखते हैं और हम कहते हैं कि हम बच्चों को संरक्षण देते हैं।ये बच्चा अभी महज दस वर्ष का है.......इसका बड़ा भाई भी काम करता है और बड़ी बहिन भी काम करती है....माँ भी काम करती है.....पिता है
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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भागना परछाइयों के पीछे-पीछे…

छुटपन में, जब पेड़ों की परछाइयाँ धूप से लड़ते-लड़ते, शाम को थककर ज़मीन पर पसर जाती थीं, तो हम उनकी फुनगियों पर उछल-कूद मचाते थे और कहते थे “देखो, हम पेड़ की फुनगी पर हैं”—बचपन कितना मासूम होता है, परछाइयों से खेलकर खुश हो लेता है. पर,
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अनुश्री घोष की डायरी

यह डायरी अनुश्री घोष ने ग्यारहवीं में हुए असाइनमेंट के लिए लिखी थी.मुझे इसमें रचनात्मकता दिखी तो रख लिया था.आप इसमें परीक्षा,घर,बंधुत्व और स्कूल को बड़ी निर्दोष,ईमानदार नज़र से देख पाएँगे.अनुश्री आजकल बारहवीं में पढ़ती हैं.बांग्ला मातृभाषा है.प्राचार्य
 
शशिभूषण
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स्कूल तो पढ़ने के लिए होता है

कल मैं आठवीं कक्षा में अरेंजमेंट के तहत पढ़ाने गया तो आपस में बहस कर रहे बच्चों ने घेर लिया.सर,एक डाउट है.पूछो.सर,प्रार्थना किस धर्म की सबसे अच्छी है?इस सवाल का सीधा जवाब देने की मेरी हिम्मत नहीं हुई.मैंने खुद को सम्हालते हुए सबको शांत करके
 
शशिभूषण
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अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (2.)

मेरे और अम्मा के अघोषित युद्ध में अक्सर दीदी शान्ति-स्थापना का असफल प्रयास किया करती थीं. वो एक ओर मुझे समझाती कि अम्मा तुम्हें बहुत प्यार करती हैं, बस दिखाती नहीं हैं, दूसरी तरफ अम्मा से कहती कि ज्यादा मार-पीट से गुड्डू और ढीठ होती जायेगी. न मुझे दीदी
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"बचपन"

बचपन की बातें बचपन के किस्से, धुंधलाती यादों के चमकीले हिस्से,इस आज से जुड़े हैं, गुज़रे कल के तार,जब दोस्ती थी सबसे, हर रिश्ते में था प्यार याद आते है वो मस्ती, बेफिक्री के पल, जब आज से था मतलब, न सूझता था कल,शरारतें, बदमाशियां ...बदमाशियों पे मार,जब
 
Yogesh Sharma
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अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (1.)

मैंने जब से होश सँभाला, अपने और अम्मा के बीच एक अजीब सा तनाव पाया. शायद इसका कारण मेरा छोटा भाई रहा हो, जिसकी वजह से मैं “दुधकटही बिटिया” बन गई थी या शायद कुछ और, पता नहीं, पर हम दोनों में कभी पटी नहीं. मैं जब कुछ महीने की थी, तभी मेरा भाई
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पिताजी का बचपन (2)

पिताजी के बचपन में देश में विद्यालयों की संख्या बहुत कम थी. उन्हें खुद लगभग दस किलोमीटर दूर पढ़ने जाना पड़ता था. रास्ते में एक नदी और उसके किनारे श्मशान पड़ता था. वापस लौटते-लौटते अंधेरा हो जाता था. पिताजी के साथ के लड़के सारे रास्ते हनुमान चालीसा पढ़ते
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असमय परिपक्व होता बचपन

अभी हाल ही में एक समाचार देखा सुना कि , किसी विद्यालय में एक सातवीं कक्षा में पढ रहे  बालक ने , अपने ही विद्यालय की तीसरी कक्षा में पढ रही एक बच्ची से बलात्कार करने की कोशिश की , ऐसा ही एक समाचार था कि कुछ बच्चों ने अपने एक सहपाठी को खेल के मैदान
 
अजय कुमार झा
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पिताजी का बचपन (1)

मेरे पिताजी के बारे में लोग कहते थे कि वे अपने समय से पचास साल आगे की सोच रखने वाले इन्सान थे. बहुत ही खुले विचारों के, तार्किक, बुद्धिवादी, बेहद लोकतान्त्रिक, मस्तमौला और फक्कड़ किस्म के आदमी थे. वे नास्तिक थे. मतलब, ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे. ये
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मैं मलयालम हूँ

मेरे घर से स्कूल तक का सफ़र काफ़ी छोटा है.कुल तीन मिनट का पैदल रास्ता.इस बीच बहुत से छात्र-छात्राएँ मिलते हैं.कई बार अपने स्कूल के विद्यार्थियों से भरी सड़क में उनके अभिवादनों का जवाब देते हुए ही स्कूल आ जाता है.कभी फोन पर उलझा रहूँ तो कितने अभिवादन
 
शशिभूषण
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इंतजार में भूखा बचपन

जरूरी मुददों की लगातार उपेक्षा वास्तविकताओं से आंख मूंदकर बनाई अनुचित नीतियां और उचित नीतियों का भी गलत तथा भ्रष्टï क्रियान्वयन सरकार विरोधी लहर को जन्म देता है, पालता -पोसता है। इस लहर के बनने में सबसे बड़ा हिस्सा बुनियादी जरूरतों की आपराधिक उपेक्षा
 
सुभाष चन्द्र
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बचपन से ही किस्मत ने छोड़ दिया साथ

कहा जाता है कि मां बच्चे की पहली गुरु होती है, लेकिन ऐसे लाखों बच्चे होते हैं जिन्हें मां तो क्या बाप की परछाई भी नसीब नहीं होता। असुरक्षा की वजह से ऐसे लोग कुछ ऐसे फैसले ले लेते हैं, जो उनकी जिंदगी को तहस-नहस कर देते हैं। पूर्व आईपीएस अधिकारी किरन ब
 
किरन बेदी
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....खामोखां

मै खुश हूँ आज .......खामोखां जिन्दगी है परेशां आज ........खामोखां आज कल लोग मिलते है कुछ इश तरह , हंस देते है ,मुझे दूर से ही देख कर ......खामोखां बचपन में मै डरता था अँधेरे से , डर था मुझे अँधेरे में किसी भूत के होने का , कुछ बड़ा हुआ तो पता चला मै
 
vibhor
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बच्चों की पोशाक और जेंडर-भेद

आज अपने इस लेख के माध्यम से मैं एक नयी बहस करने जा रही हूँ. पिछले कुछ दिनों मैं अपनी दीदी के यहाँ रहकर आयी हूँ. दीदी की नौ साल की बेटी है. किशोरावस्था की ओर कदम बढ़ाती इस बच्ची की कुछ बातों को सुनकर आश्चर्य होता है कि कैसे बचपन से ही हम बच्चों के मन
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अपने बच्चों के लिए एक चिठ्ठी

डॉ. प्रवीण चोपड़ा के ब्लॉग पर इस पोस्ट में दिखाए गए स्लाइड-शो ने सभी पाठकों को भावुक कर दिया. मेरे बच्चे अभी बहुत छोटे हैं लेकिन उनके साथ बिताए हर पल मेरी आंखों के सामने आ गए. तीन महीने पहले बुखार से तप रहे तीन साल के बेटे की दवाई लाने के लिए रात के
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गुजरे हुए दिनों से सिफारिश !!

बचपन की सुबह बहुत प्यारी होती थी...सुखद एहसासों वाली सुबह जब तब याद आ ही जाती है. उन बचपन के दिनों में एक ख़ास दिन भी हुआ करता था जब माँ सुबह उठते ही मुझे बाहों में भर कर गोद में ले लेती और ढेर सारा दुलार करती. नहीं माँ मुझे और सोना है...थोडा और सोने
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बहती नाक, खिसकती निक्कर

लगता है ये हफ़्ता, बचपन की यादें सप्ताह होकर रहेगा। बचपन की यादों मे जब भी गोते लगाओ, काफी मजा आता है। इसी बहाने वर्तमान की परेशानियों से कंही दूर हँसता खिलखिलाता बचपन याद करके हम तरोताजा हो उठते है। सच है कितना अच्छा था अपना बचपन। सभी लोगों की बचपन क
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कठपुतली का खेल

पिछले कुछ दिनों अस्पताल में रहना पड़ा तो पहले भी कई बार देखी फिल्म साउंड ऑफ म्यूजिक अपने लैपटॉप पर देख रहा था। फिल्म में एक दृश्य है जिसमें बच्चे घर पर ही अपने मेहमानों को कठपुतली का खेल दिखाते हैं। इस दृश्य को देख कर अपने बचपन के दिन याद आ गये जब हम
 
कथाकार
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बचपन को मुस्कराने दें

आज 24 फरवरी हमारे भांजे का जन्मदिन है। वैसे ये कोई विशेष बात नहीं है कि ब्लाग पर बताया जाये क्योंकि न तो हम उसका कोई कार्यक्रम मना रहे हैं और न ही हम इस अवसर पर उसके पास हैं। वह हम सबसे दूर नई दिल्ली में बैठा अपनी नौकरी में व्यस्त है। हाँ जीजाजी और द
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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