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फैज़ अहमद फैज़ को याद करते हुए

हम देखेंगे लाजिम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिसका वादा है जो लौह-ए-अजल में लिखा है जब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरां रुई की तरह उड़ जाएँगे दम महकूमों के पाँव तले जब धरती धड़ धड़ धड़केगी और अहल-ए-हिकम के सर ऊपर जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-ह