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धनुष सरीखा प्लाट

धनुष सरीखे प्लाट में, चले हृदय पर तीर।सब बांधव बैरी बने, आँसू बहाय वीर।।आँसू बहाय वीर, कोई ना पूछे हाल।होय जिगर का खून, रहे रोज आँखें लाल।।कह ‘वाणी’ कविराज, बनो तुम उसी सरीखे।या झट बेचो आप , प्लाट जो धनुष सरीखे।। शब्दार्थ: हृदय पर तीर = हार्दिक पीड़ा,
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बना न बेचारा बीन्द

बना न बेचारा बीन्द डम-डम-डम डमरू बजे , भू डमरू आकार ।जिसका प्यारा नाम है,करे न कोई प्यार ।।करे न कोई प्यार, आँख में मोतियाबिन्द । नेत्र विकार ऐसा , बना न बेचारा बीन्द ।। कह ’वाणी’ कविराज , कह आज मरूँ कल मरूँ ।नव जीवन तू पाय, बेच वह डम-डम डमरू ।।
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बना न बेचारा बीन्द

बना न बेचारा बीन्दडम-डम-डम डमरू बजे , भू डमरू आकार ।जिसका प्यारा नाम है,करे न कोई प्यार ।।करे न कोई प्यार, आँख में मोतियाबिन्द । नेत्र विकार ऐसा , बना न बेचारा बीन्द ।। कह ’वाणी’ कविराज , कह आज मरूँ कल मरूँ ।नव जीवन तू पाय, बेच वह डम-डम डमरू ।। शब्दार्थ:
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धन-धन थानेदार

धन-धन थानेदार चन्द्र सरीखा सदन हो, धन मुश्किल से आय ।रहे न चार दिन वह तो, चोर-चोर ले जाय ।।चोर-चोर ले जाय , ना आवे थानेदार ।बहुत देर से आय , धन मांगे थानेदार ।।कह ’वाणी’ कविराज, ना देखा उस सरीखा ।धन-धन थानेदार ,जो सिंह चन्द्र सरीखा ।। शब्दार्थ: सदन =
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धन-धन थानेदार

धन-धन थानेदार चन्द्र सरीखा सदन हो, धन मुश्किल से आय ।रहे न चार दिन वह तो, चोर-चोर ले जाय ।।चोर-चोर ले जाय , ना आवे थानेदार ।बहुत देर से आय , धन मांगे थानेदार ।।कह ’वाणी’ कविराज, ना देखा उस सरीखा ।धन-धन थानेदार ,जो सिंह चन्द्र सरीखा ।। शब्दार्थ: सदन =
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अण्डा जैसा प्लाट

अण्डा जैसा प्लाट अण्डा जैसा प्लाट जो, ले लेवें श्रीमान ।सभी तरफ दुश्मन बढें, रक्षा कर भगवान ।।रक्षा कर भगवान, दो त्यागने की सलाह ।जीवन भर पुकारे, हे ईश्वर हे अल्लाह ।।कह ’वाणी’ कविराज , अपराध बिन खा डंडा ।जीवन बिगड़ा जाय , खाय ब्राह्मण भी अण्डा ।।
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चमचा देय बनाय

चमचा देय बनाय चमचा जैसी भू जहाँ, चमचा देय बनाय।पंखाकार जिसे कहे, पंखे से धन जाय।।पंखे से धन जाय, जाय दूधिया जानवर।ना रहते पास पशु, कैसे पास रहते नर।।कह ‘वाणी’ कविराज, सब गया कुछ नहीं बचा ।देख जाने वाले, थाली कटोरी चमचा।। शब्दार्थ : चमचा = चम्मच/चापलूस
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शकटाकार जंमीं

शकटाकार जंमीं शकटाकार जमीं जहाँ, जान जंग-मैदान। बीमारी जाय न कभी , जाय धन और धान ।। जाय धन और धान, क्रोध करते अग्नि-देव । करेगा देव-देव, सुने न कभी महादेव ।। कह ‘वाणी’कविराज , जीवन भर रह बीमार । छोडूँ-छोडँू न कर , छोड़ जमीं शकटाकार ।। शब्दार्थ: शकटाकार =
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है ! चारभुजा

है ! चारभुजा चार भुजा असमान हो, शून्य होयगा मान। धन भी छोड़े आपको, अंत होय अपमान।। अंत होय अपमान, मन सदैव अशांत रहे। दौड़-दौड़ के जाय, जंगल के एकांत में।। कह ‘वाणी’ कविराज, ढूंढ़े सब अनुज अनुजा । जोड़े लंबे हाथ, मदद कर हे ! चारभुजा।। शब्दार्थ: चार भुजा=प्लाट
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त्याग दो ऐसा त्रिभूज

त्याग दो ऐसा त्रिभूज त्रिभुज जहाँ कहीं बने , समझ उसे त्रिशूल । दिन-दिन भारी कष्ट दे , कभी न कर तू भूल ।। कभी न कर तू भूल, हो मुकदमा बिना बात। धन का होवे धूल, धूल उड़ेगी दिन-रात।। कह ‘वाणी’ कविराज, जेल जाय अग्रज-अनुज। बिताय चैदह साल, त्याग दे ऐसा त्रिभुज।।
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पति बजाएगा तबला

पति बजाएगा तबलातबला जैसी भू जहाँ, है पूरी बेकार।तुम सौदा कैंसल करो, करके तुरंत तार।।करके तुरंत तार, जी भर बजाओ ताली।नहीं तो वही प्लाट, कर देय धन से खाली।।कह 'वाणी' कविराज , सुनले बात तू अबला।धंधा पानी छूट, पति बजाएगा तबला।। शब्दार्थ: बेकार = व्यर्थ,
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पति बजाएगा तबला

पति बजाएगा तबला तबला जैसी भू जहाँ, है पूरी बेकार।तुम सौदा कैंसल करो, करके तुरंत तार।।करके तुरंत तार, जी भर बजाओ ताली।नहीं तो वही प्लाट, कर देय धन से खाली।।कह 'वाणी' कविराज , सुनले बात तू अबला।धंधा पानी छूट, पति बजाएगा तबला।। शब्दार्थ: बेकार = व्यर्थ,
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धनुष सरीखा प्लाट

धनुष सरीखा प्लाट धनुष सरीखे प्लाट में, चले हृदय पर तीर। सब बांधव बैरी बने, आँसू बहाय वीर।। आँसू बहाय वीर, कोई ना पूछे हाल। होय जिगर का खून, रहे रोज आँखें लाल।। कह ‘वाणी’ कविराज, हो तुम भी उस सरीखे। या करलो यह काम, दो प्लाट धनुष सरीखे।। शब्दार्थ: हृदय पर
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धनुष सरीखा प्लाट

  धनुष सरीखे प्लाट में, चले हृदय पर तीर। सब बांधव बैरी बने, आँसू बहाय वीर।। आँसू बहाय वीर, कोई ना पूछे हाल। होय जिगर का खून, रहे रोज आँखें लाल।। कह ‘वाणी’ कविराज, हो तुम भी उस सरीखे। या करलो यह काम, दो प्लाट धनुष सरीखे।।   शब्दार्थ: हृदय पर तीर
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चक्राकार प्लाट

चक्राकार प्लाट चक्राकार प्लाट जहाँ, किया नया निर्माण। सब पैसा पूरा हुआ , कौन करेगा त्राण।। कौन करेगा त्राण , माता-पिता है पैसा। पैसा रहा न पास, है भाई शत्रु जैसा।। कह `वाणी´ कविराज, करो उसे वगाZकार। कुछ-कुछ भुजा छोड़ो, रख न प्लाट चक्राकार।। शब्दार्थ :
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