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प्रेमचंद का मर्मस्पर्शी कृषक-चिंतन [आज पुण्यतिथि पर विशेष प्रस्तुति] - पुनीता ठाकुर

जन चेतना के जागरणकर्ता तथा मानवीय मूल्यों के वाहक के रूप में महान् साहित्यसर्जक प्रेमचंद भारतीय समाज के सबसे सफल चितेरे रहे हैं। उनका जीवन और साहित्य जनवादी रहा है। उन्होंने अपनी कलम सामाजिक एवं राष्ट्रीय समस्याओं को ध्यान में रखकर चलायी। वे कालजयी र
 
साहित्य-शिल्पी
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जय हिन्दी हो !!

तो जनाब हिन्दी दिवस तो निकल गया पर हम वो थोड़े ही ना हैं जो हिन्दी केवल हिन्दी दिवस वाले दिन ही पढ़ते, लिखते या बोलते हैं... अब जब भारतीय फिरंगियों को (जिन्हें हिन्दी आती ही नहीं) रत्ती भर इस बात का गम नहीं है कि अपनी मातृभाषा ही नहीं आती है तो हम भी कम
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प्रेमचंद और प्रेमचंद की परंपरा में आदिवासी कहाँ हैं?

(झारखंड के प्रमुख संस्कृतिकर्मी पंकज का ये लेख ई-मेल से मिला है। कई पुराने मठो और मूर्तियों के विखंडन के इस दौर में पढ़िए पंकज को।)2009 की 31 जुलाई के एक दिन बाद जब सारे हिंदी साहित्यकार प्रेमचंद जयंती आयोजनों की थकावट दूर कर चुके होंगे, मैं अपना यह सवाल
 
दिलीप मंडल
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आख़िर इन विवादों की मंशा क्या है ?---एक

आज कल कई पुराने पिटे पिटाये जिन्नों (मुद्दों) को नए-नए चोले पहना कर फ़िर से बोतल से निकाल दिया गया है. और साहित्य के कुछ नए पुराने पुरोधा फ़िर से अपने अपने तर्क-वितर्क लेकर बहस के अखाड़े में उतर आए हैं. बहस जारी है . और लोग बाग़ इन हम्मामों में नंगे हो
 
अरविन्द कुमार