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ओह! पुरस्कार ठुकरा दिया, अरे यह क्या गजब किया कविवर?

खबर है कि हिंदी साहित्य के एक बड़े कवि ने एक बड़े साहित्यिक पुरस्कार को ठोकर मार दी है। पुरस्कार को ठोकर और वो भी हिंदी के साहित्यकार द्वारा, बात कुछ हजम नहीं हुई। मेरे विचार में बड़े कवि ने बड़ा पुरस्कार ठुकराकर अच्छा नहीं किया। जैसे-तैसे जोड़-जुगाड़
 
अंशुमाली रस्तोगी
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60वां गणतंत्रता दिवस - दुष्‍यंत के दस सवाल

पिछले दिनों जयपुर के मेरे मित्र दुष्‍यंत ने अपने अखबार के आज के अंक के लिए मुझसे 10 सवाल पूछे। यही सवाल हम सब अपने आप से भी पूछ सकते हैं।आजादी के समय मेरा परिवार क्या था और मेरा बचपन कैसे गुजरा?मैं 1952 में पैदा हुआ। होश संभालने पर पाया कि हमारा परिवार
 
कथाकार
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सायास ही किसी का रुदन नहीं होता......

सायास ही किसी का रुदन नहीं होता , वेदना जब असीम हो जाय सब कुछ धरा का धरा  रह जाता  है चाहे वह कोई खुशी हो , त्यौहार हो या नव वर्ष ...!  कल एक ओर सारे लोग नूतन वर्षाभिनन्दन में मग्न थे और पास में ही पड़ोसन का बेटा गुम हो गया । माहौल अफरातफरी
 
हेमन्त कुमार
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अरे ! नया साल, नया साल.....

पड़ोस के बच्चे ने अपने साथी से कहा--"नया साल तुम्हें मुबारक हो"साथी ने कहा -अरे !साल तुमने दिया ही नहींयह क्या कह रहे हो ...?अरे ! नया साल, नया सालमेरी मांजब कहती है-अरे बाबा !किताब मुबारक होवह हमें किताब जरूर देती हैतुमने हमें साल कब दिया.......?जो कह
 
हेमन्त कुमार
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जयपुर में कहानी पाठ- कुछ नोट्स

पिछले दिनों जयपुर जाना हुआ. पहले तो मी‍टिंग की तारीख तय न हो पाने की वज़ह से जाना टलता रहा फिर बम धमाकों की वज़‍ह से जाना टला. मीटिंग तो अपनी जगह थी लेकिन मेरे ध्‍यान में जयपुर के वे सभी साहित्‍यकार और पत्रकार मित्र थे जो मेरे आने की खबर पा कर लगभग र
 
कथाकार
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बायें हाथ से काम करने वालों का दिन

आज अखबार ने बताया कि आज लैफ्ट हैंडर्स डे है. जब भी इस तरह के डे की बात पढ़ता हूं तो यही अफसोस होता है‍ कि बरस भर के बाकी दिन तो दूसरों के लिए लेकिन एक दिन आपका. अब चाहे मदर्स डे हो या फादर्स डे. साल में एक दिन आपका. भले ही अपने देश का करवा चौथ का व्र
 
कथाकार
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कबाड़खाना.ब्‍लागस्‍पाट.कॉम पर किताबों की दुनिया पर मेरी पोस्‍ट

अच्‍छी किताबें पाठकों की मोहताज नहीं होतीं - मेरी ये पोस्‍ट पढि़ये kabaadkhaana.blogspot.com पर. आपकी राय का इंत‍ज़ार रहेगा सूरज प्रकाश
 
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आप बोलेंगे हिन्‍दी में और कम्‍प्‍यूटर टाइप करेगा

आप बोलेंगे हिन्‍दी में और कम्‍प्‍यूटर टाइप करेगा जी हां, अब बाजार में एक ऐसा औजार आ गया है कि आप बोलेंगे हिन्दी में और कम्‍प्‍यूटर टाइप करेगा. आपसे बोलने में गलती होगी तो उसे दोबारा बोलने पर ठीक भी कर देगा. इतना ही नहीं, आपके प्री रिकार्डेड संदेश, भा
 
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मैंने पढ़ी किताबें - 2008 में

मैंने पढ़ी किताबें और देखीं फिल्में यहां मैं 2008 के दौरान पढ़ी गयी उन किताबों की फेहरिस्त दे रहा हूं जो मैंने खरीदीं या किसी न किसी बहाने मुझ तक पहुंचीं। कुछ किताबें पुस्तकालय से ले कर भी पढ़ी होंगी लेकिन उनके नाम अभी याद नहीं आ रहे। ऐसी किताबें भी
 
कथाकार
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नमक के बहाने

पुणे में वह मेरा आखिरी दिन था। लगभग पचास महीने वहां बिताने के बाद मैं मुंबई वा‍पिस जा रहा था। जो दो एक दावतनामे थे, वे निपट चुके थे। मैं वहां अपने आखिरी दिनों में होटलों में ही खाना खा रहा था। बेशक सामान बाद में ले जाता, मैं अगली सुबह वापिस जा रहा था
 
कथाकार
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बुकर प्राइज़ की जगह देखना चाहते हैं तेजेन्द्र कथा यूके सम्मान को

बुकर प्राइज़ की शुरुआत लगभग 40 बरस पहले हुई थी। एक बरस छोड़ कर दिया जाने वाला ये सम्मान अब तक सात भारतीय लेखकों की कृतियों पर भी दिया जा चुका है। सम्मान के लिए पात्र होने के लिए किताब के साथ स्तरीय होने के अलावा बस, एक ही शर्त जुड़ी होती है कि उसका
 
कथाकार
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समीक्षक बोले तो, मिठाई की दुकान चलाने वाला हलवाई

आप मानें या न मानें लेकिन हिंदी साहित्य में जो लोग अच्छे लेखक या साहित्यकार न बन सके, वे अंततः समीक्षक बन गए। हिंदी साहित्य में समीक्षक की स्थिति ‘मिठाई की दुकान चलाने वाले हलवाई’ के समान होती है। जिस प्रकार हलवाई अपनी दुकान में, ग्राहकों के लिए, तरह
 
अंशुमाली रस्तोगी
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युवा पुत्र की अकाल मौत से उपजे शून्‍य में घुटता परिवार

बेंगलूर में रहने वाले मेरे मित्र के जवान बेटे की पिछले बरस नवम्‍बर में रात के वक्‍त एक सड़क दुर्घटना में मृत्‍यु हो गयी थी। बेचारा डेढ़ घंटे तक सड़क पर घायल पड़ा रहा। मां परेशान हाल मोबाइल से उससे बात करने की कोशिश कर रही थी। तभी वहां से गुज़र रहे कि
 
कथाकार
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मार्क्स याद आते हैं

युवा पीढ़ी मार्क्स को नहीं जानती। मार्क्स से विमुख रहती है। मार्क्स ने क्या कहा? क्या लिखा? वे नहीं जानते न जानने की जिज्ञासा रखते हैं। मार्क्स न उनके चिंतन का विषय हैं न वैचारिकता का। मार्क्स के प्रति जितना हमारा समाज शून्य है उतना ही युवा वर्ग भी।
 
अंशुमाली रस्तोगी
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बोरिस पास्‍तरनाक - व्‍यक्तित्‍व

बोरिस पास्तरनाक कलम में एक जानवर की तरह, मैं कट गया हूं अपने दोस्तों से, आज़ादी से, सूर्य से लेकिन शिकारी हैं कि उनकी पकड़ मजबूत होती चली जा रही है। मेरे पास कोई जगह नहीं है दौड़ने की घना जंगल और ताल का किनारा एक कटे हुए पेड़ का तना न आगे कोई रास्ता है औ
 
कथाकार