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परशुराम-स्तुति

अक्षय तृतीया पर विशेष प्रस्तुती  [१]नयन करुणा समम दृष्टि सौम्यता मुख प्रेम वृष्टि ब्रह्म तेजस निःसृती इव ....................... गंधित कमले [यययी..ययी]....................... परशुराम नमे [यययी..ययी]....................... परशुराम नमे
 
PRATUL
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क्या प्रजातांत्रिक संवेदना का अंत हो चुका है

सुकमा के चिंतलनार जंगल में जो जवान बर्बरतापूर्वक मारे गये - शोषक नहीं थे, बुर्जुआ नहीं थे, पूँजीवादी नहीं थे । जानलेवा संकट की संपूर्ण संभावना के बाद भी जानबूझकर सीआरपीएफ की नौकरी में थे । ताकि देश में शांति और अमनचैन की निरंतरता बनी रहे । ताकि ख़ुशहाली
 
जयप्रकाश मानस
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काली आंधी के दिन-गंगा जमुनी तेहज़ीब और ६ दिसंबर ----विश्लेषण

आप ही देखिये सबसे नीचे के चित्र में , अखबार के सम्पादकीय को -किसने महज़ एक सम्पादक को हक़ दिया की ६ दिसंबर को देश भर से एकत्र, प्रजातंत्र देश की जनता को काली आंधी कहे , एक अदना व्यक्ति इस तरह स्वयंभू विद्वान् बन कर देश की जनता का अपमान करे औरस्वयं ही
 
Dr. shyam gupta
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पापा ! नक्सली सचमुच बदमाश हैं

राज्योत्सव में टंगे कुछ चित्रों के बहाने कई बार शब्दों का अपना जादू नहीं चल पाता । वे अपने भीतर समाये हुए अर्थों को भावक या मनुष्य के मस्तिष्क तक पहुँचा नहीं पाते । पूरी पंक्तियाँ साधारणीकरण की शिकार हो जाया करती हैं । विचार के गर्भ तक पहुँचते-पहुँचत
 
जयप्रकाश मानस
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एक खुला खत

आशुतोष जी, आप इतने असंतोष क्यों है ?आशुतोष कुमार नामक किसी पत्रकार या लेखक द्वारा जनसत्ता में प्रकाशित लेख ( प्रख्यात कवि आलोचक श्री अशोक बाजपेयी के जनसत्ता 19 जुलाई, 2009 के अंक में कभी-कभार में प्रकाशित आलेख ‘सहचर की याद’ के एक वाक्य को बीज वाक्य बनाकर
 
जयप्रकाश मानस