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अपने ब्लोग का प्रचार अवश्य कीजिये किन्तु इस तरह से नहीं ...

आप एक पोस्ट लिखते हैं और उसमें एक टिप्पणी भी आ जाती है कुछ इस तरह सेः"मेरे फलाँ ब्लोग में आकर कृपया अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें।"याने कि आपने अपने पोस्ट में क्या लिखा है, क्यों लिखा है, सही लिखा है या गलत लिखा है इन बातों से टिप्पणी करने वाले को कुछ भी
 
जी.के. अवधिया
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थोड़ा अध्ययन, थोड़ा अनुभव और थोड़ी कल्पनाशीलता ... और क्या चाहिये पोस्ट लिखने के लिये?

बड़े जोश और उत्साह के साथ लोग आ रहे हैं ब्लोगिंग के क्षेत्र में। जब कोई अपना ब्लोग बना लेता है उसे कुछ कुछ अन्तराल में अपडेट भी करना होता है जिसके लिये सामग्री (content) की जरूरत होती है याने कि पोस्ट लिखनी पड़ती है।अंग्रेजी ब्लोगिंग में तो ये पोस्ट लिखना
 
जी.के. अवधिया
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लगता है ब्लागजगत अब समझौतावादी हो गया है.........

मुझे लग रहा है कि अब इस ब्लागजगत में मठाधीशी, अनामी-बेनामी ब्लागर, तेरा धर्म-मेरा धर्म जैसी टपोरपंथी, अन्याय, वगैरह से लडने की शक्ति बिल्कुल ही चूक गई है, तभी तो कितने दिन हो गए ऎसी कोई धमाकेदार सी किसी को गरियाती हुई कोई पोस्ट नहीं दिखाई पडी. विश्वास
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
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कितना समय लगता है आपको एक पोस्ट तैयार करने में

लंबे समय से मन में विचार आ रहा था कि अपने ब्लाग बिरादरी के मित्रों  से यह पूछा जाए कि वे कितने समय में एक पोस्ट तैयार करते हैं। ऐेसा विचार इसलिए आया क्योंकि जहां तक हमारा सवाल है तो हमें एक पोस्ट को तैयार करने में महज 10 मिनट का समय लगता है। इतना कम
 
राजकुमार ग्वालानी
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नापसन्द बटन याने कि बन्दर के हाथ में उस्तरा

कितना लिखें इस नापसन्द के बारे में? अब तो इस विषय में लिखने के लिये हमारी लेखनी भी सकुचाती है। वैसे भी नापसन्द के विषय में बहुत से लोगों के विचार पोस्ट और टिप्पणियों के माध्यम से आ ही चुके हैं। इतना होने के बावजूद भी हमें इस विषय में लिखना ही पड़ रहा है
 
जी.के. अवधिया
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हमारा पोस्ट ब्लोगवाणी में टॉप पर कैसे आता है?

आदमी तिकड़मी न हो तो किस काम का? हम भी बहुत बड़े तिकड़मी हैं और अपने पोस्ट को ब्लोगवाणी में टॉप में लाकर छोड़ते हैं। हमारे लिये तो चुटकी बजाने जैसा है यह काम तो। अब आप पूछेंगे कि कैसे?वो ऐसे कि सबसे पहले तो हम अपने आकाओं के द्वारा तैयार किये गये मैटर को लेकर
 
जी.के. अवधिया
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गुरूजी गुरूजी चाम चटिया---बड़े गुरूजी को अर्पित पोस्ट .............ललित शर्मा

हम तो स्वभाव से ही साधू हैं, जैसे मंदिर में रोज भाव भक्ति से अगरबत्ती जला कर फ़ूल चढाते हैं ठीक वैसे ही भिनसारे  उठ कर अपनी पोस्ट लिखते हैं सब काम छोड़ कर....... और फिर बटन दबा कर ब्लाग जगत
 
ललित शर्मा
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आलोक मेहता को एक चपत राम लाल की भी.

कोई आलोक मेहता किसी अख़बार में ब्लागरों के बारे में कुछ उल्टा-सीधा लिख कर होली मना चलता बना. बाद में पता कि हिन्दी ब्लागरों से पंगा लेने वाले ये सज्जन आजकल राजनीति के गलियारों में संसद-सदस्यता सूंघते घूम रहे हैं. ये पत्रकार टाइप कुछ हैं; यहां-जुगाड़
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और भी बहुत कुछ है ब्लॉग पर इनके अलावा लिखने को !!!

क्या हो गया है ब्लाग के तमाम साथियों को? यह प्रश्न हमारा स्वयं अपने आप से है क्योंकि पता नहीं आप सभी से प्रश्न पूछने का अधिकार है भी या नहीं? यह प्रश्न इस कारण से उभरा क्योंकि पिछले तीन-चार दिनों से देखने में आ रहा है कि ब्लाग पर तीन चार विषय ऐसे आ गये
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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आप तो बस लिख दीजिये ... आपने क्या लिखा है यह आपके टिप्पणीकर्ता खुद बता देंगे

ये मैं नहीं कह रहा हूँ बल्कि लिख्खाड़ानन्द जी के द्वारा हमें दिया गया गुरु मन्त्र है। उनका कहना है कि पोस्ट लिखने के लिये यह समझने की जरूरत नहीं है कि मैं क्या लिख रहा हूँ। आप तो बस लिख दीजिये! आपने क्या लिखा है यह आपके टिप्पणीकर्ता खुद ही बता देंगे।
 
जी.के. अवधिया
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बेवकूफ ब्लोगर अब टिप्पणी पर भी पोस्ट निकालने लग गये हैं

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!""नमस्काऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!""क्या बात है लिख्खाड़ानन्द जी, कुछ परेशान से लग रहे हैं?""क्या बतायें टिप्पण्यानन्द जी, बहुत दुःखी हैं भाई हम तो। अजब-अजब लोग आ गये हैं हिन्दी ब्लोगिंग में। हम तो समय निकाल कर उनके ब्लोग में
 
जी.के. अवधिया
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तो अब हम भी चलें

मजबूरी है। जाना तो पड़ेगा ही। जिस प्रकार से संसार असार है उसी प्रकार से यह ब्लोगजगत भी असार है। कब तक बने रहेंगे यहाँ? कब तक सींग कटा कर बछड़ों में शामिल होते रहेंगे? कब तक नये लोगों को पुरानी बातें बता बता कर बोर करते रहेंगे? आखिर कब तक? हमारे कई साथी तो
 
जी.के. अवधिया
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ब्लोगिंग तो मौज लेने के लिये होती है ... ब्लोगिंग फॉर्मूले

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!""नमस्काऽऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!""लिख्खाड़ानन्द जी, हम तो आपके लेखन के कायल हैं! लाज़वाब लिखते हैं आप! लोग आपको उस्ताद जी कहते और मानते हैं। क्या बात है आपकी! आज हम जानना चाहते हैं कि आखिर इतना अच्छा लिख कैसे लेते हैं जिसे
 
जी.के. अवधिया
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ये पोस्ट निकालना क्या होता है ज्ञानदत्त जी? ... एक प्रश्न समीर जी से भी

मेरे पोस्ट "मैंने कब कहा कि जिस पोस्ट में मैंने टिप्पणी नहीं की वह "व्यर्थ लेखन" या "निरर्थक पोस्ट" है" में टिप्पणी की हैः:-)अच्छा हुआ, आपने एक पोस्ट निकाल ली!अब मैं ठहरा मन्दबुद्धि प्राणी। इस टिप्पणी का अर्थ ही नहीं समझ पाया। मेरे हिसाब से तो मैंने कुछ
 
जी.के. अवधिया
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मैंने कब कहा कि जिस पोस्ट में मैंने टिप्पणी नहीं की वह "व्यर्थ लेखन" या "निरर्थक पोस्ट" है

मैंने एक पोस्ट लिखा था "मैं टिप्पणी क्यों करता हूँ"। पोस्ट में मैंने सीधे सरल शब्दों में सिर्फ यह बताया था कि टिप्पणी करने के मेरे अपने क्या कारण हैं। पर वहाँ की कुछ टिप्पणियों को पढ़ कर मुझे पता चला कि उस पोस्ट के सीधे अर्थ के अलावा भी और अर्थ हो सकते
 
जी.के. अवधिया
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टिप्पणी करने का आज आखिरी मौका - कल से टिप्पणी-द्वार बंद हो रहा है

प्रिय ब्लाग साथियो, कई बार यह निर्णय करना बहुत ही कठिन होता है कि क्या किया जाये? इसके अलावा यह भी कठिन होता है कि जो कर रहे हैं वह सही है अथवा नहीं? अभी तक जो हो रहा है, वह सही है अथवा जो आगे होगा वह सही होगा?इस तरह की ऊहापोह लगभग सभी के साथ आई होगी।
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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चिट्ठाकारों के लिए एक नायाब नुस्खा!!!!!!!!!!!!!!!!!!

 कुछ दिनों पहले हमने अपनी एक पोस्ट के जरिए आप लोगों से चिट्ठाकारी करने के उदेश्यों के बारे में जानना चाहा था। जिसमें आप सब लोगों नें अपने अपने उदेश्यों को जाहिर किया तो जानकर हमें तो अपनी निरूदेश्यता पर शर्म से महसूस होने लगी। सोचा कि जब सब लोगों
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
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मेरे पोस्ट मात्र चौबीस घंटे ही प्रभावशाली रहते हैं

मैंने अनुभव किया है कि मेरे पोस्टों का प्रभाव मात्र चौबीस घंटे तक ही रहते हैं। प्रायः चौबीस घंटे तक ही उन्हें पढ़ा जाता है और उसके बाद वे न जाने अन्धकार के किस गर्त में खो जाते हैं। लगता है कि संकलकों के आगे वाले पृष्ठों में रहने तक ही उनका प्रभाव रहता
 
जी.के. अवधिया
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अब ब्लागवाणी में किसी पसंद बटन को दोबारा क्लिक करने का मतलब है अपनी पसंद वापस लेना

क्या आपने कभी नये ब्लागवाणी में किसी पोस्ट को दो बार क्लिक कर के देखा है?नये ब्लागवाणी में नई बात यह है कि यदि आपने भूलवश किसी पोस्ट के पसंद बटन को क्लिक कर दिया है तो आप फिर से उसे क्लिक करके अपनी पसंद वापस भी ले सकते हैं। किसी पोस्ट के पसंद बटन को
 
जी.के. अवधिया
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मुझे वही पोस्ट अधिक पसंद आता है जो कि आम पाठकों के लिये लिखी गई हो

रोज ही मैं हिन्दी ब्लोगों के अधिकतर पोस्टों को पढ़ता हूँ किन्तु मुझे वही पोस्ट अधिक पसंद आता है जो कि आम पाठकों के लिये लिखी गई हो। आम पाठकों के लिये लिखी गई पोस्ट से मेरा मतलब है जिसे पढ़ने से किसी की कुछ जानकारी मिले, उसे कोई सार्थक सन्देश मिले या फिर
 
जी.के. अवधिया
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ज्वालामुखी न फोड़ें....हाथ मिलाएं और दिल भी मिलाएं

आज शाम को मौका मिला कि नेट को चला सकें तो बैठ गये। सोचा था कि बुन्देलखण्ड पर कुछ लिखकर लगायेंगे। उससे पहले इधर-उधर की दौड़ लगाते रहे। कुछ पढ़ा, कुछ पर टिप्पणी भी की और शब्दकार की कुछ पोस्ट को सही भी किया। इधर-उधर की दौड़ा भागी में दो-चार पोस्ट ऐसी दिखीं
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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क्या टिप्पणियाँ ही किसी पोस्ट की गुणवत्ता का मापदंड हैं?

टिप्पणियों के मोह से आज कोई भी हिन्दी ब्लोगर अछूता नहीं है। टिप्पणियों का मोह कोई अस्वाभाविक बात नहीं है किन्तु जिस प्रकार से हिन्दी ब्लोगजगत में टिप्पणियाँ पा लेने का मोह है उससे तो लगता है कि टिप्पणियाँ ही किसी पोस्ट की गुणवत्ता का मापदंड है। याने कि
 
जी.के. अवधिया
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10 मिनट में तैयार होती है एक पोस्ट

लंबे समय से मन में विचार आ रहा था कि अपने ब्लाग बिरादरी के मित्रों से यह पूछा जाए कि वे कितने समय में एक पोस्ट तैयार करते हैं। ऐसा विचार इसलिए आया क्योंकि जहां तक हमारा सवाल है तो हमें एक पोस्ट को तैयार करने में महज 10 से 15 मिनट का समय लगता है। इतना कम
 
राजकुमार ग्वालानी
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समीरलाल जी "पियो-पियो और जियो, जी भर के जियो"

आज कई दिन के बाद ब्लाग संसार को देखा और सुना। कई दिनों से मन भी नहीं लग रहा था और दूसरा कारण काम का बोझा भी आ गया था। आज इधर-उधर उल्टा-पुल्टा तो ब्लाग गुरू समीरलाल की पोस्ट देखी जो दारू और कविता से (शायद दारू नहीं कहेंगे, स्काच) ओतप्रोत थी। यह तो सभी
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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आज एक पहेली :

किसी ने क्या खूब कहा "सलीका चाहिए फूलों की गुफ्तगूँ के लिए " कोई बताएँ पूरा शेर क्या है बताइये
 
गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल'
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