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सोनेरी धुराचा ठसका

    डॉ. उज्ज्वला दळवींचं ‘सोनेरी धुराचा ठसका’ वाचलं. सौदी अरेबियामध्ये पंचवीस वर्षं डॉक्टर म्हणून काम करतानाचे त्यांचे अनुभव त्यांनी रोचक भाषेत मांडलेत. प्रवासी म्हणून एखाद्या देशात जाणं, आणि तिथे राहून, ‘आतले’ म्हनून तो देश अनुभवणं यात
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आचार्य…

” उध्या जर माझी समाधी बांधायची झाली तर त्यावर एकच वाक्य लिहा- हा माणूस मुर्ख असेल,हयाच्या हातुन अनेक चुका झाल्या असतील ; पण हा कॄत्घन मात्र कधीही न्वहता.” गेल्या आठवड्य़ातच वि.र.काळे हयांच ’आचार्य अत्रे : महाराष्ट्रातील बलदंड व्यक्तीमत्व’ हे
 
देवेंद्र चुरी
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शाळा

मिलिंद बोकीलच शाळा हे पुस्तक कितव्यांदा तरी वाचून काढलं. प्रथमपुरुषी एकवचनी स्टाइलमधे लिहिलेली ही कादंबरी आहे. ‘९वि’तले काही मित्र शाळा भरण्याआधी एका बांधकाम सुरू असलेल्या बिल्डिंग मधे जमून भंकस करत असतात. ही कादंबरी वाचून प्रत्येकाला शाळेचे दिवस आठवतील.
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लेडिज कूपे (पुस्तक समीक्षा )

पिछले बीते दिन कुछ स्वस्थ ठीक नहीं था ,पर दिल शुक्रिया करता है इस तरह बीमार पड़ने का भी ..इसका भी एक अलग ही सुख है जब डाक्टर बेड रेस्ट के लिए कह दे और आपके आस पास दवाई के रेपर के साथ बिस्तर पर कुछ किताबे बिखरी हुई हो और कोई आपको अधिक डिस्टरब नहीं करता :)
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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शोषण के अभयारण्य

वैश्वीकरण की इस बीच जितनी चर्चा हुई है उस लिहाज से हिंदी में उस पर अर्थशास्त्रीय अनुशासन के तहत लगभग नहीं के बराबर काम हुआ है। विशेष कर ऐसा काम जो सामान्य पाठक को उसकी सैद्धांतिकी के साथ व्यवहारिक पक्षों से भी परिचित करवा सके।अशोक कुमार पाण्डेय, कवि होने
 
vijay gaur/विजय गौड़
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एक अधुरी आणी खरी प्रेमकहाणी…

पुस्तकाच पहिल पान उघडल तिथे लिहल होत…. Not everyone in this world has the fate to cherish the fullest form of love. some are born,just to experience the abbreviation of it. म्हणजे जगात सगळ्यांनाच परिपुर्ण प्रेमाचा आनंद उपभोगण्याच नशिब लाभत नाही,तर
 
देवेंद्र चुरी
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5.+1 ते 3Ϊ

एका मध्यमवर्गीय पंजाबी कुटुंबात २२ एप्रील १९७४ ला जन्म, १९९५ साली ‘ आयआयटी दिल्ली ‘ आणि १९९७ साली ‘ आयआयएम-अहमदाबाद ‘ मधून पास आउट तेही ‘ बेस्ट आऊटगोइंग स्टुडंट ‘ चं मेडल घेउन.हाँगकाँगमधील एका मोठ्या नामांकीत अमेरिकी
 
देवेंद्र
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रंगीले गाँधी पर सपाट प्रतिक्रिया

ब्रह्मचार्य के गाँधीजी के प्रयोग एक बकवास से ज्यादा कुछ नहीं थे. अच्छा होता कस्तुर “बा” को “बा” यानी माता न बना कर स्वस्थ सहशयन करते तो एक आदर्श पति का उदाहरण भी बनते.
 
संजय बेंगाणी
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‘लीक’ से बाजार बनाने का फंडा

लीक’ से बाजार बनाने का फंडा इन दिनों नंदिता पुरी जो कि पेशे से पत्रकार व स्तंभकार हैं, चर्चा में हैं। मुद्दा है उनकी पुस्तक ‘अनलाइकली हीरो : द स्टोरी ऑफ आ॓मपुरी’ के कुछ अंश के लीक हो जाने का। मामला महज पुस्तक के अंश के लीक होने का होता तो शायद यह जबर
 
दीपक राजा
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अज्ञेय के निबंध

प्रयोगवाद और नई कविता के विशिष्ट कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय ’ का स्वर अत्यंत वैविध्यपूर्ण है. एक कुशल कवि होने के साथ साथ वे एक सफल उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार और संपादक भी हैं. अज्ञेय मध्यवर्ग की पीड़ा से भली भाँति परिचित हैं. मध्यवर्ग
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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ऋता शुक्ल की कहानियों में सामाजिक जीवन

ऋता शुक्ल की रचनाओं में तिवारीपुर का परिवेश दीखता है. किसी भी रचनाकार के लिए परिवेश से कटकर रहना संभव नहीं होता . अतः ऋता शुक्ल ने भी अपनी रचनाओं के माध्यम से अपने परिवेश में निहित व्यष्टिगत एवं समष्टिगत समस्याओं को उकेरा है और जनमानस को सोचने के लिए
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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मुक्तिबोध के सौंदर्य सिद्धांत

हम जानते हैं कि नई कविता के प्रमुख हस्ताक्षर गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनाएँ पाठकों और आलोचकों के लिए चुनौती हैं. उनकी प्रतीकात्मकता एवं बिंब विधान मौलिक तथा किंचित दुरूह भी है. उनकी रचनाओं में सामाजिक चेतना, लोक मंगल की भावना, सौंदर्यानुभूति तथा जीवन के
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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बालशौरि रेड्डी और उनका साहित्य

दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार-प्रसार में वरिष्ठ लेखक बालशौरि रेड्डी का योगदान सराहनीय है. उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, समीक्षा, आलोचना आदि साहित्यिक विधाओं के माध्यम से दक्षिण भारत की संस्कृति को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का काम किया है. मौलिख
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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'समुद्रापारचे समाज' विषयी

विकासाच्या आणि समृद्धीच्या पारंपारिक कल्पना, जागतिकीकरण, जातीभेद अशा अनेक विषयांबाबतचे आपले पूर्वग्रह अतिशय बळकट असतात त्यामुळे काही गोष्टी दिसत असूनही आपण न पाहिल्यासारखे करतो तर कधीकधी 'मोडेन पण वाकणार नाही' अशा दुराग्रही निगरगट्टपणाने त्यांचे समर्थन
 
आजानुकर्ण
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पुस्तकांच्या आठवणी

रात्रंदिन वाचनाचा ध्यास असण्याच्या आणि तेवढा वेळ असण्याच्या काळात, मिळेल तिथुन, आणि मिळेल तशी पुस्तके वाचुन काढली. त्या वाचनवेडात पार बुडुन गेले ते आता बाहेर यायचं काही लक्षण नाही. या प्रवासात पुस्तके ही साथीदार होती. आमच्या घरात कुठलेही कपाट उघडले की
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द ओव्हरकोट

ह्या पुस्तकाचा प्रभाव बघा, द नेमसेक मध्ये निकोलाइ गॉगल च्या द ओव्हरकोट, ह्या गोष्टी चा बर्‍याचदा उल्लेख आहे. वास्तविक पाहता द नेमसेक काही रित्या द ओव्हरकोट भोवती आखलेली आहे. एवढे काय आहे ह्या (द ओव्हरकोट) गोष्टी मध्ये? आणि कोण हा निकोलाइ गॉगल? मला