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छलना...कब तक छलती रहोगी तुम...

.html-marquee {height:200px;width:400px;background-color:FF9933;font-family:Cursive;font-size:22pt;color:000066;font-weight:bold;border-width:4;border-style:dotted;border-color:3300CC;} छलना!मुझको छलती रही है तूसदियों सेमाना जिसकोसदैव समर्पित हुआठीक उसी
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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सयंमी होने का एकांतवास

.html-marquee {height:200px;width:400px;background-color:FF9933;font-family:Cursive;font-size:22pt;color:000066;font-weight:bold;border-width:4;border-style:dotted;border-color:3300CC;} क्यों झेल रहे तुमसंयमी होने का एकांतवास...प्रिय,क्या ना जानूं
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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एक कुटिल प्रेमी की आदर्श-व्याख्या

.html-marquee {height:200px;width:400px;background-color:FF9933;font-family:Cursive;font-size:22pt;color:000066;font-weight:bold;border-width:4;border-style:dotted;border-color:3300CC;} वो तुम्हारी निगाह से उतर गए...माना कि कुछ तो कमज़ोर थे,दृढ़ नहीं रह
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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पनीली आंखों के आगे खुशबूदार शाम

.html-marquee {height:200px;width:400px;background-color:FF9933;font-family:Cursive;font-size:22pt;color:000066;font-weight:bold;border-width:4;border-style:dotted;border-color:3300CC;} तुमने कहा क्या फायदा हुआ-इस साथ से?हम नहीं रह पाए पास...नहीं हो
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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नहीं बनना महान

मुझे नहीं बनना आदर्श पुरुष,या फिर देवता...नहीं चाहिए लेबलमहान होने कामैं बने रहना चाहता हूं...सारी दुर्बलताओं से ग्रस्तएक आम इंसान!जो बिना झिझक केआंख को जो अच्छा लगे,मन को जो शीतल कर दे...प्राणों को जो झंकृत कर दे...उसको बिना हिचक-अपना कह दे!ऐसी दिव्यता
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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आत्मज्ञान तक पहुंच / समझा हूं / कि हूं / कन्फ्यूज़्ड

पिछली पोस्ट में कुछ कविताएं आपके लिए हाज़िर की थीं...वही सिलसिला जारी है...सुंदरता पर / निश्वास / छोड़ता हुआ भी / तन्मय कब तक रहता मैं?आदमखोर चरित्र को दरकिनार कर / सत्यवसन रहता मैं...नहीं झेल सकता मैं अब एक भी मुखौटे वाला चेहराउतार डाले सभी
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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बरसों पहले की कबिताई...

कई दिन हुए, चौराहा पर कविता जैसा कुछ नहीं लिखा...। आज कुछ पुराने काग़ज़ मिले...उनमें कबिताई जैसा कुछ दिखा...सोचा आपके लिए यहां उतार दूं...साल 1996-97 से लेकर 2000-01 के बीच  की ये कविताएं हैं संभवतः....लीजिए, एक के बाद एक...होते हैं कुछ और मायने भी
 
चण्डीदत्त शुक्ल