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दो चार कदम चल सकते हो

दो चार कदम चल सकते हो ,दो बातें भी कर सकते होदो दिन की है पहचान मगर ,तुम इतना तो कर सकते होदो कदम जो मेरे साथ चलोतो जान सकोगे दशा मेरीकुछ भाव मेरे , कुछ शब्द मेरेकुछ आग मेरी , कुछ व्यथा मेरीमैं चलूँगा धीरे-धीरे ताकिबातें सालो साल चलेंमुझसे भी धीरे चले
 
संदीप पाण्डेय
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पुनीत की कवितायेँ

आप पुनीत से मिलेंगे तो मेरे इस हंसमुख युवा दोस्त की आँखों में एक अजीब सा खलल दिखेगा आप को। उसका एक मासूम सा सपना है जिसे करोडो आँखें अलग अलग समय में देखती रही हैं । वो इस दुनिया से खुश नहीं है और एक दिन इसे बदल देना चाहता है। पुनीत को पढना अच्छा लगता है।
 
संदीप पाण्डेय