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गांधी को प्रासंगिक नहीं रहने देंगे हम ?

दस साल बाद……इस अग्रलेख के बारे में :- यह अग्रलेख प्रथम बार 2 अक्टूबर सन् 2000 को नवभारत समाचार-पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर ‘गांधी जयंती पर विशेष’ सामग्री के रूप में प्रकाशित हुआ था। उस समय नवभारत ग्वालियर संस्करण के सम्पादक श्री
 
डॉ. रामकुमार सिंह
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बैठ कुर्सी पर वो उत्सव बन गये/आप-औ’ हम शामियाने हो गये …..हिन्दी गज़ल

इस गज़ल के बारे में :- मेरी यह गज़ल ‘पाखी’ के मार्च 2009 अंक में प्रकाशित हुई थी। ‘सर्जना’ पर ‘पुनर्प्रकाशन’ के अंतर्गत जारी कर रहा हूँ। यह गज़ल पहली बार प्रकाशित करने के लिए ‘पाखी’ एवं सम्पादक अपूर्व जोशी जी
 
डॉ. रामकुमार सिंह
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”भूख है तो सब्र कर, रोटी नही तो क्या हुआ”/दुष्यंत : सामाजिक पीड़ा की प्रखर अनुभूति

इस अग्रलेख के बारे में : तब मैं साहित्य का नहीं, विज्ञान का विद्यार्थी था। पहली बार दुष्यंत कुमार का नाम पता चला जब ग्वालियर में श्रीमती अंजना मिश्र ने ‘दुष्यंत जयंती’ मनाई। मैं और मेरे साथी दुष्यंत को शकुंतला वाला दुष्यंत समझे थे। फिर
 
डॉ. रामकुमार सिंह
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‘सर्जनात्मक अध्येता का समीक्ष्य से एकात्म होना’

प्रस्तुत पुस्तक-समीक्षा ‘आजकल’ पत्रिका (सूचना-प्रसारण विभाग, भारत सरकार) के मई-2009 अंक में प्रकाशित हुई थी, जिसका पुनर्प्रकाशन ‘सर्जना’ पृष्ठ पर किया जा रहा है। —————–
 
डॉ. रामकुमार सिंह