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पिता के विश्वास .की अप्रतिम जीत (वाणी गीत)

," ये तो पूरी मिट्टी हो गयी है ...दूसरी बेटी है ना तुम्हारी , ले जाओ घर " उस एक महीने की नन्ही सी बच्ची के लगभग नीले पड़ते से चेहरे को देखते हुए चिकित्सक ने पिता को कहा ।फक्क चेहरा लिए सीढियां उतरते पिता उस बच्ची को कलेजे से लपेटे फफक पड़ा । दूसरी बेटी
 
वाणी गीत
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पिता का जीत गया विश्वास ....

" ये तो पूरी मिट्टी हो गयी है ...दूसरी बेटी है ना तुम्हारी , ले जाओ घर " उस एक महीने की नन्ही सी बच्ची के लगभग नीले पड़ते से चेहरे को देखते हुए चिकित्सक ने पिता को कहा ।फक्क चेहरा लिए सीढियां उतरते पिता उस बच्ची को कलेजे से लपेटे फफक पड़ा । दूसरी बेटी के
 
वाणी गीत
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वक़्त का घूमता पहिया और ये पति परमेश्वर

पहली बार व्यंग-विधा को आजमाने की कोशिश की है और इसका श्रेय जाता है कुछ मित्रों को. सबसे पहले तो चंडीदत्त  शुक्ल जी ने कहा,आप व्यंग लिखने की भी कोशिश कीजिये. पर मैंने उनकी बात बिलकुल ही अनसुनी कर दी क्यूंकि अब तक  Jack of All Trades, Master of
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ब्लॉगिंग का दो महीना (34 वीं पोस्ट -- 725 पाठक-- 341 कमेंट---10 followers)....गुरू जी, क्या मैं दूसरी कक्षा में जा सकता हूँ ..?

जब मैं  करीब सात-आठ साल की उम्र का था तब मेरे पिताजी ने एक बार मुझसे कहा था-" आदमी को पढ़ना चाहिए". उस समय मेरे दिमाग में दो बातें समझ में आई . पहला यह कि चूँकि वे केवल  चौथी पास थे और बिजनेस में बहुत मेहनत करते थे तो मुझको लगा कि पढ़ने से
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हज़रत मुहम्मद साहब स. ने बताया कि बाप के मुक़ाबले माँ तीन गुना ज़्यादा आदर और सेवा की हक़दार है । Greater than Paradise .

जो धारणीय है , वह धर्म है । धर्म का स्रोत ईश्वर है । ईश्वर किसी आदर्श मनुष्य के अन्तःकरण में अपनी वाणी का अवतरण करता है और उसे जीवन जीने की विधि सिखाने वाला विधान देता है । कुछ लोग धर्म से हटकर अपने अनुमान से कुछ नियम क़ानून बनाते हैं । यह धर्म नहीं दर्शन
 
DR. ANWER JAMAL
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दाग़ ?

एक बच्चा था, बेहद गुस्सैल. गुस्से में वह कुछ भी कर डलता. एक दिन उसके पिता ने उससे कहा कि इतना गुस्सा उसी के लिए हानिकारक है. बच्चे ने कहा कि गुस्सा कम करने के लिए वह कया करे? पिता ने उसे ढेर सारी कीलें दीं और कहा कि जब जब तुम्हें गुस्सा आये, तुम ये कील
 
Vibha Rani
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पिता के साथ बिताये आखिरी ३ दिन ...पिता की याद

पिताजी को गुजरे आज १२ वर्ष हो गए ...मगर जेहन में उनके साथ बिताये आखिरी तीन दिन हमेशा की तरह ताज़ा ही हैं ...माँ के घर उपरी मंजिल का निर्माण कार्य चल रहा था जिसके कारण माँ यही आई हुई थी ...पापा को अपने किसी काम से दिल्ली आना पड़ा था ...26जनवरी और रविवार की
 
वाणी गीत
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नमन

जिसने मुझेउँगली पकड़करचलना नहीं सिखायाकहा कि खुद चलोगिरो तो खुद उठो,जिसने राह नहीं दिखाई मुझेकहा कि चलती रहोराह बनती जायेगी,जिसने नहीं डाँटा कभीमेरी ग़लती परलेकिन किया मजबूरसोचने के लियेकि मैंने ग़लत किया,जिसने कभी नहीं फेरामेरे सिर पर हाथदुलार सेपर
 
mukti
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बाप-बेटे के संबंध में प्रतिद्वंद्विता का भाव

इवान तुर्गनेव की एक मशहूर कहानी है -मेरा पहला प्यार। इसका नायक किशोर वय का एक बालक है, जो पड़ोस में रहने वाली अपने से बड़ी उम्र की एक लड़की से प्यार करता है। शुरू में वह लड़की भी उसके प्यार को स्वीकार करती है, लेकिन कुछ दिनों बाद वह अचानक उससे खिंची-
 
बालमुकुंद
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मेरे पिता और पक्षी फीनिक्स

कुछ दिन पहले मैं अहमदाबाद के रेलवे स्टेशन पर खड़ा बठिंडा को जाने वाली रेलगाड़ी का इंतजार कर रहा था, मैं खड़ा था, लेकिन मेरी नजर इधर उधर जा रही थी, लड़कियों को निहारने के लिए नहीं बल्कि कुछ ढूंढने के लिए, जो खोया भी नहीं था। इतने में मेरी निगाह वहां पर स्
 
कुलवंत हैप्पी
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सबसे बड़े तानाशाह - हमारे बाप!

बात कॉलेज के ज़माने की है। कैंटीन में मैं और मेरा दोस्त अमित चाय पी रहे थे। एकाएक अमित ने मुझसे पूछा कि तुम बता सकते हो दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह कौन है? मैंने झट से जवाब दिया, हिटलर। उसने कहा, नहीं। मैंने फिर जवाब दिया, मुसोलनी। उसने कहा, 'तुम गलत
 
प्रेमचंद गुप्ता
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खून से लथपथ पिता जब घर पहुंचे

सुबह के चार बजे घर का दरवाजा किसी द्वारा खटखटाने की आवाज आई और मेरी मां दरवाजे की तरफ दौड़ी, क्योंकि आधी रात के बाद से वो मेरे पिता का इंतजार कर रही थी, जिसको ढूँढने के लिए मेरे परिवार के सदस्य गए हुए थे। ऐसे में अगर हवा भी दरवाजा खटखटा देती तो भी स्वाभिक
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बाबू जी

बाबू जी   आलोक श्रीवास्तव घर की बुनियादें दीवारें बामों-दर थे बाबू जी सबको बाँधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी तीन मुहल्लों में उन जैसी कद काठी का कोई न था अच्छे ख़ासे ऊँचे पूरे क़द्दावर थे बाबू जी अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है अम्मा
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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FATHER'S डे...

जून, जिसे हम FATHER'S DAY के रूप में जानते हैं... मनाते हैं तो नही कह सकता... क्योंकि मुझे नही लगता कि सच में कोई मनाता होगा... हो सकता है ये बात कई लोगों को ग़लत लगे या फ़िर इससे किसी के मन को आघात पहुँच सकता है... मैं उन तमाम लोगो से इस बात के लिए क
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जा, उड़ जारे पंछी ! ६ ( अन्तिम)

Sunday, July 6, 2008 जा,उड़ जारे पंछी!६)(माँ का अपनी बेटीसे मूक संवाद) और फिर तेरे सिंगारके दिन शुरू हो गए!!तुझे शोर शराबा पसंद नही था। संगीत जैसे किसी कार्यक्रमका आयोजन नही था,लेकिन इस मौके के लिए मौज़ूम हों, ऐसे कुछ ख़ास गीत CDs मे टेप करा लिए थे...सब
 
shama
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जा, उड़ जारे पंछी ! ४

Friday, July 4, 2008 जा, उड़ जारे पंछी!४)(माँ का अपनी बेटीसे मूक संभाषण.) सितम्बर के माह मे तेरे पिता का महाराष्ट्र के डीजीपी के हैसियतसे बढोत्री हुई। इत्तेफाक़न उस समय मै अस्पतालमे थी और इस खुशीके मौकेका घरपे रहके आनंद न उठा सकी !पर सपनेभी जो बात मुझे सच
 
shama
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