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सड़क

गोरखपुर से सीधे दिल्ली आया तो बहुत कुछ झेलना पड़ा था..उन्हीं दिनों में लिखी थी एक कविता अनगढ़ सी..एक शाम का सच है ये..मै भीड़-भाड़ वाली सड़क से चला जा रहा हूँ और क्या-क्या सोचते जा रहा हूँ..लोग टकरा रहे हैं और ठीक-ठाक बके जा रहे हैं.... ] चलूँ; जरा न
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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आई लव यू पापा !

पापा मैं जब भी गिरा , जब भी जीवन से हाराआपको हर पल अपने बहुत करीब पायामैं जब भी अँधेरों से घबरायाआपकी थपकी से ही रोशनी पाया .पापा आपकी शिक्षाओं मेंजीवन का दर्शन है , आप कहते हैं -"जो तोको काँटा बोय , ताहि बोय तो फूलताको फूल के फूल है वाको है त्रिशूल
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पापा को क्या दूं बर्थ डे में

मेरे पापा राजकुमार ग्वालानी का 1 जुलाई को बर्थ डे आने वाला है। सोच रही हूं कि आखिर उनको क्या दूं। कुछ ऐसी ही कशमकश में मैं तब भी थी जब कुछ दिनों पहले फादर्स डे था। तब मैंने पापा से ही पूछा कि पापा मैं आपको क्या दूं। मैं जब भी पापा से ऐसे किसी मौके पर
 
swapnil
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थन्दे थन्दे पानी छे नहाना चाहिए

गल्मी भोत बल गयी है। तो मैं भी दिन भल एछी में बैथता हूँ। जब बिजली जाती है, तो भाग कल बाथलूम में घुछ जाता हूँ। आप भी देथो। मेली छोती छी बाल्ती है ओल छेम्पू भी। वैछे आप तभी पानी पतल पाते हैं त्या??? मैं भी पानी पतलने की भोत कोछिछ कलता हूँ, मगल बो पतल म
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