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सर्मपण से होता है दुखों का अन्त Submission to God

मनुष्य का मार्ग और धर्मपालनहार प्रभु ने मनुष्य की रचना दुख भोगने के लिए नहीं की है। दुख तो मनुष्य तब भोगता है जब वह ‘मार्ग’ से विचलित हो जाता है। मार्ग पर चलना ही मनुष्य का कर्तव्य और धर्म है। मार्ग से हटना अज्ञान और अधर्म है जो सारे दूखों का मूल है।
 
DR. ANWER JAMAL
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स्वर्ण रखना महापाप

श्री प्राप्ति के लिए शास्त्र एवं परम्पराओं के अनुकुल आचरण करना आवश्यक है। आर्यावर्त (जम्बुद्धीप) या कहे आज का दक्षिण एसिया इसलिए कंगाल है क्यो कि हम शास्त्रों के निर्देशो का पालन नही कर रहे है। हमारे यहाँ अमीर भी कंगाल जैसा हीं है। अगर हम सामुहिक रुप से
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पोस्ट लिखना कौन सा कठिन काम है, कोई भी लिख सकता है

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!""नमस्काऽऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!""सुनाइये क्या चल रहा है?""चलना क्या है? अभी अभी एक पोस्ट लिखकर डाला है अपने ब्लॉग में और अब हम ब्लागवाणी पर अन्य मित्रों के पोस्टों को देख रहे हैं।""अच्छा यह बताइये लिख्खाड़ानन्द जी, आप
 
जी.के. अवधिया
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