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कवच [एक चित्र काव्य]

नयन चार करना नवीनता यही क्षणिक पहला पागलपन नहीं मिलन को आती तन्वी रेतीला होता मेरा मन मेरे आकर पास कल्पना कर देती है मुझको कायर सुरबाला को देखूँ अपलक उत्कंठित रहता है अंतर कोस रहा है कब से सच्चा नख से शिख तक तुमको निज मन लगी को आकर कौन बुझाय मिलन को