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मन की तरंगे......

कब तक कोई बाहर ही देखता रहे...समझ मे नही आता कि बाहर ऐसा क्या है ?..... जिस का मोह हम से छूटता ही नही। कितना तो भाग चुके इन सब के पीछे.....कितनी सफलताएं असफलताएं हाथ आई हैं, ऐसा लगता है हमें ।......लेकिन जब पीछे मुड़ कर देखते हैं तो सिवा खालीपन के कुछ नजर
 
परमजीत बाली
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ना हिन्दू बुरा है ना मुसलमान बुरा है......

ना हिन्दू बुरा है ना मुसलमान बुरा है जिसने ये देश बाँटा वो इंसान बुरा है। गाँधी गोली खा मरे बहुत बुरा हुआ सुभाष लापता हुए बहुत बुरा हुआ फायदा किसे हुआ जानता है रब.. देश ना समझा ये बहुत बुरा हुआ। चुप रहके सब देखना, मान बुरा है। ना हिन्दू बुरा है ना
 
परमजीत बाली
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चंद मुक्तक

ना पूछो, वक्त ने क्या क्या सितम ढहाए हैं। अपनो ने जो रास्ते हमको अब तक दिखाए हैं समझ आता नही जाए कहां कोई बता दो यार, यहां हर मोड़ पर हमने देखे बस चौराहे हैं। ************************************ हरिक चौराहे पर अब भीड़ दिखती है। वह ऐसा मुझे हर खत मे लिखती
 
परमजीत बाली
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दो क्षणिकाएं

पता नही- किस की नजर लग गई है... अब मेरा बटुआ पहले जैसा नजर नही आता। जेब मे होते हुए भी जेब में है... लेकिन... मै जान नही पाता। ***************************** इस मंदी से मार.... हम और तुमको खानी है। नेता तो इस मंदी से भी फायदा उठाएंगे। वे जानते हैं ...
 
परमजीत बाली
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बुझी चिंगारीयों को फिर से हवा मिल रही है..

 बिना कारण कुछ भी तो नही होता.....समस्याए पैदा ही तभी होती हैं जब कोई कारण हो।..यदि समय रहते उस कारण को दूर कर दिया जाए तो यह अंसभव है कि वह समस्या ज्यादा देर टिक पायेगी।क्यों कि कोई बाहरी दुश्मन तभी किसी देश मे हस्तक्षेप कर सकता है जब उसको वहाँ कोई
 
परमजीत बाली
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दुआ कीजिए.........

शिकायत किसी से क्या कीजिए। खुद अपना दामन बचा लिजिए। बहुत धोखा खाया है चेहरों से हमने, मुखौटा ये अपना हटा लीजिए। पहचानते हैं हम भी अपना पराया ऐसे ख्याल ना भीतर पालीए। कदम अब संभल कर हम रख रहे हैं, मंजिल तक पहुँचे दुआ कीजिए।
 
परमजीत बाली
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बुझी चिंगारीयों को फिर से हवा मिल रही है..

बिना कारण कुछ भी तो नही होता.....समस्याए पैदा ही तभी होती हैं जब कोई कारण हो।..यदि समय रहते उस कारण को दूर कर दिया जाए तो यह अंसभव है कि वह समस्या ज्यादा देर टिक पायेगी।क्यों कि कोई बाहरी दुश्मन तभी किसी देश मे हस्तक्षेप कर सकता है जब उसको वहाँ कोई छिद्र
 
परमजीत बाली
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किसी से भी नही गिला.....

संभल कर जब भी चला सिवा ठोकर के मुझे क्या मिला ? लेकिन मुझे इस बात का किसी से भी नही गिला। क्योंकि मेरा संभलना, उन मेरे अपनों के लिए दुखदाई हो जाता है। जिन्हें मेरी लापरवाही से चलना बहुत भाता है। इसी लिए मेरा इस तरह चलना उन्हे रास्तों मे पत्थर रखने को
 
परमजीत बाली
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गज़ल

(नेट से साभार) आज फुर्सत मे बैठ कर कुछ गजलें सुन रहा था.."तुम इतना क्यूं मुस्करा रहे हो.." इसी को सुनने के बाद गजल लिखने बैठा और ये गजल बना ली....। इस मे उस गजल की झलक भी नजर आएगी....लेकिन फिर भी लिख दी....। जब गजल कि अंतिम पंक्तियां लिखनें लगा....तो
 
परमजीत बाली
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ये कैसी जिन्दगी है........

अपनी आवाज भी मुझ को, सुनाई नही देती। ये कैसी जिन्दगी है जिन्दगी, दिखाई नही देती। नशा है जाम का जिस मे बहक चल रहे है सब, होश मे मुझको यहाँ जिन्दगी दिखाई नही देती। हरिक पल मर रहा है जिन्दगी का सामने मेरे, पकड़ना दूर,मुझको संग भी, चलने नही देती। खुदा ने दी,
 
परमजीत बाली
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कुछ क्षणिकाएं

ठंड बहुत है.... इसी लिए सरकार ने गरीबों के लिए ठंड से बचाने के लिए यह जुगत लगाई है - महँगाई की आग जलाई है। ******************* जब कोई गलत आदमी सही बात बोलता है.... आदमी को नहीं उस की बात को मान देना चाहिए। यदि यह तुम्हें स्वीकार नही... अपने को - पहचान
 
परमजीत बाली
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दिल की बातें.........

दिल की बातों का असर अब नही होता। दुसरो के लिए कोई यहा अब नही रोता। जिन्हें सदा देख कर , मुस्कराते थे हम, उनकी तस्वीर है ये, यकी अब नही होता। खेल है किस्मत का या कहर है उनका, खुदा भी मेहरबा हम पर, अब नही होता। अब दिल की बातों को सुनना छोड़ दिया, परमजीत दिल
 
परमजीत बाली
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अब यह चुप्पी तोड़ दो

तुम से किसने कहा- तुम चुप रहो.... अपने को संभालो मत ऐसे बहो। तुम्हारा चुप रहना ही कमजोर बनाता है। दूसरो की हिम्मत बढ़ाता है। जरा अपनी तरफ देखो- तुम भी ठीक वैसे ही हो जैसा वह है.. फिर किस बात का भय है ? बस! गलत का साथ इस लिए मत दो.. क्योकि वह वही है जो तुम
 
परमजीत बाली
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अपने अपने सच....

चित्र गुगुल से साभार) सच तो मैं भी बोल रहा हुँ। सच तो तुम भी बोल रहे हो। अपने अपने सच दोनों के, दोनों को क्यों तौल रहे हो ? जो मैने भुगता, उस को गाया। जो तूने भुगता, उसे सुनाया। दोनो अपनी अपनी कह कर, अपना सिर क्यों नोंच रहे हो। सुन्दर फूलो के संग अक्
 
परमजीत बाली
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मुस्कराहट.....

एक पैकेट में ७ बन(ब्रेड) हैं. मेरी पत्नी रोज आधा खाती है और मैं एक पूरा. पहेली है कि ५ वें दिन कौन कितना खायेगा? (समीर जी की पोस्ट से साभार) यदि पत्नी मेरी हुई तो.... पहले दिन ही पैकेट खत्म हो जाएगा। स्त्री/ पुरूष विमर्श धरा रह जाएगा। ***************
 
परमजीत बाली
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मौहब्बत और फैंशन.

मौहब्बत से कहो, बातें तेरी सब मान लेते हैं। मगर हर बात पर क्यूँ , हमारी जान लेते हैं। बहुत उम्मीद थी, राहों में, चिरागे रोशनी होगी, मगर हर बार अंधेरों का दामन थाम लेते हैं। बहुत मजबूर हैं दिल से, यहाँ चलना जरूरी है, ठहर जाए अगर कोई, मुर्दा मान लेते ह
 
परमजीत बाली
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आज कैसे कर रहे हैं देखो हम करम....

बस उम्मीदों के साये मे जी रहे हम। आज अपना ही लहू पी रहे हैं हम। कौन हमको हमसे बचाएगा यहाँ आज, होठ सच के मिल यहाँ, सी रहे हैं हम। घुट घुट के निकल रहा आज अपना दम। आज कैसे कर रहे हैं देखो हम करम। प्यार पैसा बन गया हर नजर में आज। रिश्ते पैसों से बनें , क
 
परमजीत बाली
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भूत होते हैं....

आज एक पोस्ट पढ़ी "भूत प्रेत होते हैं या नही" इसी लिए इस विषय पर लिखने का विचार बन गया। भूत या आत्मा कुछ भी कहे लेकिन यह होते हैं ऐसा सभी धार्मिक ग्रंथ कहते हैं।गीता में आत्मा के बारे में कहा गया है। ईसाई आत्मा या कहे शैतान और फरिश्तों को मानते हैं।मुस
 
परमजीत बाली
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फिर जल जाएगें दीपक..........

फिर जल जाएगें दीपक रात जरा गहरी होने दो। पहले आँखों के आँसु को पूरा तो मुझको पीने दो। बहुत लगन से देख रहा था सपनो का आकाश मैं गहरे सागर में भटक रहा था मोती की तलाश में मोती की चाहत में मुझसे कुछ ऐसा था छूट गया मेरे जीवन के सब रंगों को जैसे कोई लूट गय
 
परमजीत बाली
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एक मुर्गे की मौत

ज्यादा पुरानी बात नही है। उन दिनों एक कच्ची कालोनी में रहता था। हमारे पड़ोस मे रहनें वाले एक परिवार ने बहुत मुर्गी यां पाल रखी थी।उन मे कुछ मुर्गे तो बहुत तगड़े थे कि हर कोई उन से बच कर निकलने मे ही अपनी भलाई समझता था।एक बार पता नही कैसे एक बड़े मुर्गे
 
परमजीत बाली
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तेरा खुदा जो कह रहा...

तेरा खुदा जो कह रहा, मेरा खुदा नही मानता।आदमी को आदमी, कोई नही, यहाँ मानता।रूतबों औ’ धन से यहाँ, आदमी का मोल है,आदमी का दिल यहाँ कोई नही पहचानता।अपनी ही धुन में यहाँ ,चल रहे सब बेखबर,कितनें गुल पैरों तले, कुचलें, नहीं कोई जानता।देख सुन खामोंश है दुनिया
 
परमजीत बाली
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वक्त से आगे वक्त से पीछे

बहुत भागा ......वक्त के साथ हो लूँ।लेकिनहमेशा पीछे छूट जाता हूँ।वक्त से हारने पर,अपने को सताता हूँ।लेकिनअब मैने वक्त के पीछे दोड़नाछोड़ दिया है।उस से मुँह मोड़ लिया है।अब वक्त परबिछोना बिछा करउस पर लेट गया हूँ।वक्त जहां चाहता है ,मुझे ले जाता है।अब मुझे
 
परमजीत बाली
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फरीद के श्लोक - ४१

निवणु सु अखरु,खवणु गुणु,जिहबा मणीआ मंतु॥ऐ त्रै भैणे वेस करि,तां वसि आवी कंतु॥१२७॥मति होदी होइ इआणा॥ताणु होदे होऐ निताणा॥अणहोदे आपु वंडाऐ॥कोइ ऐसा भगतु सदाऐ॥१२८॥इकु फिका न गालाइ,सभना मै सचा धणी॥हिआउ न कैही ठाहि, माणक सभ अमोलवे॥१२९॥सभना मन माणिक,ठाहणु मूलि
 
परमजीत बाली
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तुम क्यूँ जिन्दा हो......

दूसरों का दुख देख करआँख तब तक नही रोतीजब तक कोई पीड़ातुम्हारे भीतरपहले से नही सोती।इस समुंद्र के किनारेरेत में क्या खोज रहे होउसे नही पाओगे।समय की लहरेंहमेशा की तरह उसे बहा करअपने साथ ले गई होगींकहीं दूर, बहुत गहरे में,किसी पत्थर के नीचे पड़ी या दबीवह
 
परमजीत बाली
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फरीद के श्लोक - ४०

किआ हंसु किआ बगुला, जा कउ नदरि धरे॥जे तिसु भावै नानका, कागहु हंसु करे॥१२४॥सरवर पंखी हेकड़ो,फाहीवाल पचास॥ऐहु तनु लहरी गडु थिआ, सचे तेरी आस॥१२५॥कवणु सु अखरु,कवणु गुणु,जिहबा मणीआ मंतु॥कवणु सु वेसो हऊ करी,जितु वसि आवै कंतु॥१२६॥उपरोक्त श्लोक गुरु नानक देव जी
 
परमजीत बाली
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फरीद के श्लोक - ३९

हौ ढूढेदी सजणा,सजणु मैडे नालि॥नानक अलखु न लखीऐ,गुरमुखि देऐ दिखालि॥१२१॥हंसा देखि तरंदिआ, बगा आइआ चाउ॥ढुबि मुऐ बग बपुड़े, सिरु तलि उपरि पाउ॥१२२॥मै जाणिआ वड हंसु है,तां मै कीता संगु॥जे जाणा बगु बपुड़ा,जनमि न भेड़ी अंगु॥१२३॥यह श्लोक गुरू रामदास जी के उच्चार
 
परमजीत बाली
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बिखराव

१ अब तो अपने भीतर ही अपनी साँसों से जख्म होनें लगे हैं। जो सजाए थे मैने सपने कभी वे रोने लगे हैं। जरा -सी हवा के झोकों से बिखर जाएंगे। शायद फिर कभी लौट कर ना आएगे। यही सोच अब सपनो मे रंग नही भरता। लगता है कोई सपना अब मेरा नही मरता। २ आज की रात चाँद भ
 
परमजीत बाली
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फरीद के श्लोक - ३८

फरीद दरवेसी गाखड़ी,चोपड़ी परीति॥इकनि किनै चालीऐ,दरवेसावी रीति॥११८॥तनु तुधै तनूर जिउ,बालण हड बलंनि॥पैरी थकां,सिरि जुलां,जे मूं पिरी मिलंनि॥११९॥तनु न तपाऐ तनूर जिउ, बालणु हड न थालि॥सिरि पैरी किआ फेड़िआ,अंदरि पिरी निहालि॥१२०॥फरीद जी कहते हैं कि फकीरी का रा
 
परमजीत बाली
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मेरा फादर डे तो आज है.......

इन्सान का सोचा हुआ यदि हमेशा पूरा हो जाए तो सपनों को कौन देखेगा.......सपनों को कौन सजाएगा..।वैसे कोशिश तो सदा हमारी यही रहती है कि हमारे हर सपनें,हमारी हर सोच साकार होती नजर आए।लेकिन यह सब ख्याली पुलाव ही साबित होता है।जब भी हम पूरे मन से ,पूरी इच्छा
 
परमजीत बाली
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फरिद के श्लोक - ३७

ढूढेदीऐ सुहाग कू,तउ तनि काई कोर॥जिना नाउ सुहागणी, तिना झात न होर॥११४॥सबर मंझ कमाण, ऐ सबरु,का नीहणो॥सबर संदा बाणु, खालकु खता न करी॥११५॥सबर अंदरि साबरी,तनु ऐवै जालेनि॥होनि नजीकि खुदाऐ दै,भेतु न किसै देनि॥११६॥सबरु ऐहु सुआउ,जे तूं बंदा दिड़ु करहि॥वधि थीवह
 
परमजीत बाली
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गजल

जब भरे हुए जामों को , कोई होठों से लगाए , तुम ही बता दो यार कोई कैसे मुस्कराएं। दिल की अन्धेरी शब में घुटकर मरे तमन्ना , तब किसकी आरजू को हँस कर गले लगाएं। दुनियामे जबहम आए थे दुनियाकी ठोकरों मे , है कौन जो झुक के हमको , थाम अब उठाए। हमें भेजनें वाले
 
परमजीत बाली
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मत पूछिए..............

मत पूछिए क्या सोच घर से निकल पड़ा। हरिक कदम पे मुझको, पत्थर मिला पड़ा। छोड़ा था घर जिस के लिए, उसे ढूंढते रहे, वो घर अपनें बैठा रहा, जिद पे रहा अड़ा। क्यों मान दिल की बात दिल लगा बैठे, तड़पना तमाशा बना , वो हँसता रहा खड़ा। अब आखिरी साँसों में, जाना तेरा वज
 
परमजीत बाली
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गजल

जब भरे हुए जामों को , कोई होठों से लगाए , तुम ही बता दो यार कोई कैसे मुस्कराएं। दिल की अन्धेरी शब में घुटकर मरे तमन्ना , तब किसकी आरजू को हँस कर गले लगाएं। दुनियामे जबहम आए थे दुनियाकी ठोकरों मे , है कौन जो झुक के हमको , थाम अब उठाए। हमें भेजनें वाले
 
परमजीत बाली