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वो चिट्ठियों की दुनिया

अभी हाल ही में मेरे एक मित्र की सगाई सम्पन्न हुई। पेशे से इंजीनियर और हाईटेक सुविधाओं से लैस मेरा मित्र अक्सर सेलफोन या चैटिंग के द्वारा अपनी मंगेतर से बातें करता रहता। तभी एक दिन उसे अपनी मंगेतर का पत्र मिला। उसे यह जानकर ताज्जुब हुआ कि पत्र में तमाम
 
डाकिया बाबू
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पत्रों का घटता चलन एक गंभीर सांस्कृतिक खतरा- महाश्वेता देवी

भारतीय डाक विभाग के 150 वर्ष पूरे होने पर ‘भारतीय डाक : सदियों का सफरनामा’ नामक पुस्तक लिखकर चर्चा में आए अरविंद कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. अरविन्द जी से जब पहली बार मेरी बातचीत हुई थी तो वे हरिभूमि से जुड़े हुए थे, फ़िलहाल रेल मंत्रालय की मैग्जीन
 
डाकिया बाबू
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भारत में सबसे पहले चिट्ठियों ने भरी थी हवाई उड़ान

डाक सेवा का विचार सबसे पहले ब्रिटेन में और हवाई जहाज का विचार सबसे पहले अमेरिका में राइट बंधुओं ने दिया वहीं चिट्ठियों ने विश्व में सबसे पहले भारत में हवाई उड़ान भरी। यह ऐतिहासिक घटना 18 फरवरी 1911 को इलाहाबाद में हुई। संयोग से उस साल कुंभ का मेला भी लगा
 
डाकिया बाबू
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पत्र लिखिए : मित्र बनाइए

अभी वरिष्ठ साहित्यकार गिरिराज किशोर द्वारा सम्पादित पत्रिका ’अकार‘ को मैं पढ रही थी, उसमें लार्ड भिक्खु पारीख की ’ओसामा बिन लादेन बनाम महात्मा गाँधी‘ काल्पनिक पत्र-संवाद के माध्यम से लिखी रचना प्रकाशित की गयी है। एक तरफ लादेन का इस्लामवाद बनाम हिंसावाद
 
डाकिया बाबू
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चिट्ठियाँ हों इन्द्रधनुषी

जयकृष्ण राय तुषार जी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत के पेशे के साथ-साथ गीत-ग़ज़ल लिखने में भी सिद्धहस्त हैं. इनकी रचनाएँ देश की तमाम चर्चित पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाती रहती हैं. मूलत: ग्रामीण परिवेश से ताल्लुक रखने वाले तुषार जी एक अच्छे एडवोकेट व
 
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चिट्ठी की गरमाहट एक बार फिर महसूस करें

अब फोन, मोबाइल, वीडियो कांफ्रेंसिंग, फैक्स, ई-मेल और कूरियर का ज़माना है। वे दिन गए, जब लोगों के मशहूर होते ही उनकी चिट्ठियों के संग्रह भी किताब के रूप में छप जाया करते थे। अब तो चिट्ठी लिखना-पढ़ना आउट ऑफ फैशन है तो डाकघर और उनके लाल डिब्बे भी कल की बात
 
डाकिया बाबू
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एक चिट्ठी ने बदला देवानंद का भाग्य

भारत के स्क्रीन लिजेंड्स की अगर कभी लिस्ट बनाई जाएगी तो उसमें हिंदी फ़िल्मों के सदाबहार अभिनेता और निर्माता-निर्देशक देव आनंद साहब का नाम सबसे ऊपर शुमार होगा. पर बहुत काम लोगों को पता होगा कि उनके कैरियर की शुरुआत चिट्ठियों के साथ हुई थी. जी हाँ देवानंद
 
डाकिया बाबू
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चिठ्ठी में बंद यादें

मेहरुन्निसा परवेज़ का नाम साहित्य की दुनिया में जाना-पहचाना है. उनसे मेरा परिचय "समर लोक" पत्रिका के "युवा विशेषांक" के प्रकाशन के दौरान हुआ, उस समय मैं भोपाल में ट्रेनिंग ले रहा था. बाद में मेहरुन्निसा परवेज़ जी को पद्मश्री भी मिला. हाल ही में उन्होंने
 
डाकिया बाबू
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चिठ्ठियाँ

आज एक ब्लॉग पढ़ा जिसमे चिठ्ठियों का जिक्र था, पढ़ कर कई सारी पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं। मैं जब कक्षा ४ में थी तब हम लोग रतलाम से झाबुआ जिले के एक छोटे से गांव रानापुर में ट्रान्सफर हो कर गए थे । वह अपनी सहेलियों से बिछड़ने का पहला मौका था। आंसू भरी आँखों
 
डाकिया बाबू
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यादगार के तौर पर चिट्ठियाँ

21वीं सदी में संचार माध्यमों की बढ़ती उपयोगिता ने बहुत सारी चीजों को प्रभावित किया है। जाहिर है कि मोबाइल के आने के बाद से हिंदी साहित्य में जिस विधा का अस्तित्व लगभग समाप्त हो चला है वह पत्र है। हर नये साल की शुरूआत में जब भी साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में
 
डाकिया बाबू
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चिट्ठी में भी आ सकते हैं बम

अचानक नजर एक खबर पर आकर अटक गई। शीर्षक था- चिट्ठी में भी आ सकते हैं बम। लोग तो बाद में डरेंगे, पहले तो मुझे ही डरना था आखिर रोजमर्रा का मेरा काम ही चिट्ठियों को लाना और ले जाना है। खबर कुछ यूँ थी- ‘‘अपनों का कुशल मंगल बताने वाली चिट्ठी भी अमंगल का कारण
 
डाकिया बाबू
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जेब खर्च का जरिया बने प्रेम-पत्र

आपने वह कहानी तो सुनी होगी कि एक प्रेमिका प्रतिदिन अपने प्रेमी को डाकिया बाबू द्वारा प्रेम पत्र लिखवाती थी और अन्ततः एक दिन उसे उस डाकिया बाबू से ही प्रेम हो गया। पिछले दिनों अख़बार में एक वाकया देखा तो इस प्रसंग की याद आ गई. यह वाकया भी कुछ इसी तरह का
 
डाकिया बाबू