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बंगाल में मौकापरस्ती का खेल बनी हुई है बुद्धिजीविता

पक्षधरता क्या इतनी निकृष्ट हो सकती है…?कोलकाता में शोमा दास को रेप करा देने की धमकी पर बहस के दौरान कुछ लोगों का मानना था कि यह घटना एक गढ़ी हुई कहानी हो सकती है। कोई भी किसी महिला को इस तरह की धमकी नहीं दे सकता। युवा पत्रकार शोमा दास एक बजे रात को वहां
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टाइम्स ऑफ़ इंडिया की पत्रकारिता का मुलाहिज़ा फरमाइए!

मीडिया में गला काट प्रतिस्पर्धा का इससे प्रत्यक्ष उदाहरण और क्या मिलेगा! जैसा कि आप देख सकते हैं टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने माइक से 'जैन टी वी' का लोगो गायब कर दिया। टाइम्स नाउ और जैन टी वी का भला क्या मुकाबला है लेकिन फिर भी, दूसरे चैनल का नाम भी क्यूँ
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मप्र विधानसभा में बढेगी पत्रकारों की सुविधा

kya ho suvidhaye iske liye banai 6 sadsyeey samiti।भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा में अब पत्रकारों की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाएगा। ये तय hua mangalwar ko विधानसभा में hui patrkar deergha samiti की baithak main। ये baithak mangalvar ko विधानसभा
 
भीमसिंह मीणा
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मैं अपने हीरो की मौत मांगता हूं...

बड़ी अजीब सी बात है न? कोई अपने हीरो की मौत कैसे मांग सकता है? पर जनाब सच है। मैं अपने हीरो की मौत मांगता हूं। इस तरह की सोच तो काफी पहले से चल रही थी... तबसे जबसे हीरो का हीरोइज्म खत्म होता देखा। एक तरह से उसकी (माफ कीजिये, आदरसूचक शब्द का प्रयोग नहीं
 
RAJESH RANJAN
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वक्त बदल गया है, आप भी बदलिए!

प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव, मेरे करीबी रिश्तेदारों में कई जातियों के लोग हैं। ब्राह्मण से लेकर कायस्थ और नायर से लेकर दलित तक। ये सभी सभी परिवार प्रेम से रह रहे हैं। आपके परिवारों में भी लोगों ने प्रेम किया होगा और कई ने जाति से बाहर शादियां भी की
 
दिलीप मंडल
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आइए खबर की सौदेबाजी रोकें?

जिन लोगों से मिल रही प्रतिक्रिया से प्रभाष जोशी बेहद उत्साहित थे उन लोगों को आगे आकर प्रभाष जी की मुहिम को चलाना होगा और पैसे लेकर खबर छापने की कुप्रथा को खत्म करना होगा। अच्छी बात यह है कि इस लड़ाई की जमीन और रास्ता प्रभाष जी खुद तैयार करके गए हैं।
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भारत:१८वीं सदी की पत्रकारिता

पत्रकारिता में समय के साथ इसके कलेवर और चरित्र में बहुत हद तक परिवर्तन हुआ है, यह बहस का विषय हो सकता है कि पत्रकारिता का जो वर्तमान स्वरूप है क्या वह स्वस्थ पत्रकारिता है? भूमंडलीकरण में चिजें इतनी तेजी के साथ बदली कि कुछ समझने का मौका ही हाथ नहीं ल
 
मीडिया मिथ्या
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पत्रकारिता कैसे की जाये?

शोमा दास की उम्र सिर्फ 25 साल की है। पत्रकारिता का पहला पाठ ही कुछ ऐसा पढ़ने को मिला कि हत्या करने का आरोप उसके खिलाफ दर्ज हो गया। हत्या करने का आरोप जिस शख्स ने लगाया संयोग से उसी के तेवरों को देखकर और उसी के आंदोलन को कवर करने वाले पत्रकारों को देख
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पुस्तक समीक्षा : मीडिया का स्टिंग आपरेशन

पुस्तक को पढ़कर पता चलता है कि हिंदी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के पत्रकारों में 87 प्रतिशत पत्रकार सवर्ण हिंदू हैं। इनमें 34 फीसदी ब्राह्मण, 23 फीसदी राजपूत, 14 फीसदी भूमिहार तथा 16 फीसदी कायस्थ हैं। मुसलमान और दलित समाज से आने वाले पत्रकार मात्र 13
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कोलकाता में हिंदी पत्रकारिता

उदंत मार्तंड से अब तक कोलकाता की हिंदी पत्रकारिता ने एक लंबा सफर तय किया है। इस दौरान हुगली में ढेर सारा पानी बह चुका है और इसी के साथ पत्रकारिता ने भी कई बदलाव देखे हैं। अब तकनीक के लिहाज से यह बेहतर जरूर हुई है। लेकिन कंटेंट और क्वालिटी के लिहाज से
 
प्रभाकर मणि तिवारी
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भारत:१८वीं सदी की पत्रकारिता

पत्रकारिता में समय के साथ इसके कलेवर और चरित्र में बहुत हद तक परिवर्तन हुआ है, यह बहस का विषय हो सकता है कि पत्रकारिता का जो वर्तमान स्वरूप है क्या वह स्वस्थ पत्रकारिता है? भूमंडलीकरण में चिजें इतनी तेजी के साथ बदली कि कुछ समझने का मौका ही हाथ नहीं ल
 
मीडिया मिथ्या
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मीडिया की भूमिका कर्तव्य और भटकाव

आईआरएस के 2007 के आंकड़े बताते हैं कि मीडिया केवल अपना बाजार देखता है। आखिर कौन सी वजह है कि आजादी के 60 वर्ष बाद तक महिला जनसंख्या तक मीडिया की पहुंच काफी कम रही है। इसके कारण चाहे जो भी हो लेकिन इसे शुभ संकेत नहीं माना जा सकता क्योंकि लोकतंत्र में लिंग
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समकालीन समाज में मीडिया की भूमिका

समाजिक चेतना जागृत करने का सबसे महत्वपूर्ण साधन है मीडिया, जो अपनी प्रभावी प्रस्तुतियों के माध्यम से समाज को न सिर्फ दिशा देता है बल्कि उसके दिशा निर्देशों को ध्यान में रखते हुए उसे संचालित भी करता है। समकालीन समाज में मीडिया समाज की अग्रगामिता को आगे
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लोकतंत्र में संचार माध्यमों की भूमिका

रवि शंकर सिंहआजादी से लेकर आज तक लोकतंत्र के इस सुहाने सफर में संचार माध्यमों की भूमिका तलाशने पर हम पाते हैं कि समय के साथ-साथ इनकी भूमिका भी बदलती रही है। जैसे 1970 तक पत्रकारीय मूल्य मर्यादाएं प्रभावी थी पर उसके बाद व्यावसायिकता का दौर शुरू हुआ और आज
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संचार माध्यम : एक संक्षिप्त परिचय

संचार माध्यमों से पहले संचार को जानना जरूरी है। संचार शब्द अंग्रेजी के कम्युनिकेशन का हिंदी रूपांतर है जो लैटिन शब्द कम्युनिस से बना है, जिसका अर्थ है सामान्य भागीदारी युक्त सूचना।चूंकि संचार समाज में ही घटित होता है, अत: हम समाज के परिप्रेक्ष्य से देखें
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लोकतंत्र में संचार माध्यमों की भूमिका- शोध पत्र

'लोकतंत्र में संचार माध्यमों की भूमिका' विषय पर एक नया शोधपत्र प्रस्तुत है। इस विषय पर हम लगातार ५-६ लेखों की एक श्रृंखला पढेंगे जिसकी शुरुआत एक भूमिका के साथ कर रहे हैं, जिस पर चर्चा आगे जारी रहेगी ।- रवि शंकर सिंह"लोकतंत्र में संचार माध्यमों की भूमिका"
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ये वक्त के साथ खुद को बदल नहीं पाए!

प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,मेरे करीबी रिश्तेदारों में कई जातियों के लोग हैं। ब्राह्मण से लेकर कायस्थ और नायर से लेकर दलित तक। ये सभी सभी परिवार प्रेम से रह रहे हैं। आपके परिवारों में भी लोगों ने प्रेम किया होगा और कई ने जाति से बाहर शादियां भी की
 
दिलीप मंडल
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MEDIA BOOKS - (Hindi)

Suggested Reading ( हिन्दी में)Name of the book--------------------Author------------------Publisher-----------------Year*टेलीविजन और-------------------वर्तिका नन्दा-----------भारतीय जनसंचार संस्थान----2006-अपराध पत्रकारिता*मीडिया और
 
डॉ वर्तिका नन्दा
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सवाल है जवाब नही

आज मन बहुत परेशान है.....बार बार पुण्य प्रसून बाजपाई का एक इंटरव्यू जेहन में आ रहा है...यह इंटरव्यू उन्होंने हालाँकि लगभग एक साल पहले एक वेब मैगजीन को दिया था.....लेकिन उसकी याद आज भी मुझे एकदम ताज़ा है...दरअसल उन्होंने अपने इंटरव्यू में कहा था की आज
 
ashish tiwari